309 3-6-1953 चरित्र के बिना केवल शिक्षा की कीमत शून्य है - मुंबई - Page 334

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नहीं देना। मैं जो कुछ बता रहा हूं उसे पहले अच्छी तरह समझें उसके बाद ही उसमें विश्वास करना है या नहीं, इसका फैसला करें।

अखबारों में एक रोना हमेशा रोया जाता है - ‘‘चाहे कुछ करो, अस्पृश्यता मिटने वाली नहीं है। राजनीति से कहिए या धर्म के कारण कहिए अस्पृश्यता नहीं जाने वाली।’’ ऐसे लोगों को मुझसे अगर चर्चा करनी हो तो मैं उसके लिए तैयार हूं। लेकिन मुझे लगता है कि ये लोग पैदाइशी अंधे हैं। उन्होंने इतिहास नहीं पढ़ा है। आज तक दुनिया में जितने सारे परिवर्तन हुए उन्हें उनकी जानकारी नहीं है। इसीलिए वे इस प्रकार मूर्खतापूर्ण टीका-टिप्पणी करते हैं।

आज यहां बैठा विशाल महिला-पुरुषों का जनसमूह ही पिछली बार क्या हाल था और आज क्या हाल है यह समझा सकता जा है। लोग क्या कह रहे हैं उस पर आप ध्यान ना दें। वे जो भी कुछ लिखते हैं वह आपके बीच गलतफहमी फैलाने के लिए लिखते हैं। सभी अखबार मेरी आलोचना करते हैं। मुझे उसकी परवाह नहीं है। उनकी आलोचना से मेरा सम्मान कम नहीं होगा। हर साल मैं देख रहा हूं कि मेरा सम्मान बढ़ता ही जा रहा है।

नासिक सत्याग्रह की बात लीजिए। अब सच बातें आपसे कहने में हर्ज नहीं। आयु. भाऊराव गायकवाड़ आदि कुछ पांच-छह लोग ही मेरी मदद के लिए मेरे साथ थे। रात 12 बजे हमने सभा की। सत्याग्रह के लिए कितने लोग नाम देते हैं यह हमें देखना था। तब हमने क्या देखा, सुबह तक हमें सत्याग्रह के लिए एक भी आदमी नहीं मिला। लोगों के मन में डर था कि सत्याग्रह करेंगे तो क्या होगा? सुबह हमने तय किया कि हम एक जुलूस निकालेंगे। संयोगवश से कहिए या दुर्भाग्य से जुलूस में शामिल लोगों पर अन्य लोगों ने पत्थर फेंके। इस कारण पहले हमें दस-पंद्रह सत्याग्रही मिले। बाद में लोगों के ध्यान में आया कि सत्याग्रह करने में स्वाभिमान है। यह बात समझ में आते ही सत्याग्रही मिलने में कोई दिक्मत नहीं आई। बाद में हम एक-दो नहीं चार-पांच सालों तक सत्याग्रह चला सके। पुरानी बातों के बारे में सोचें तो कहना चाहूंगा कि अब काफी सुधार हुआ है।

शिक्षा की बात को ही लीजिए। मुझे स्कूल में लेना है या नहीं इस बारे में सोचने के लिए अध्यापकों की तीन दिनों तक सभाएं हुई थीं। तब सरकार से मुझे 3 रुपयों की स्कॉलरशिप मिलती थी। इस लड़के को अगर स्कूल में नहीं लिया तो सरकार के खफा होने का डर है सोच कर आखिर मुझे हाईस्कूल में प्रवेश देने की बात तय हुई थी। उस समय ठेठ गांव का बच्चा था। उसमें मैं ब्राह्मणों की तरह जूते पहनता था। पहले दिन मैं जब हाईस्कूल पहुंचा तब मेरे 40 साल के भाई की कमीज पहनकर गया था। पैरों तक की कमीज पहने हुए बच्चे का मेरा अखतार था। तब एल्फिन्स्टन में कई बच्चे