309 3-6-1953 चरित्र के बिना केवल शिक्षा की कीमत शून्य है - मुंबई - Page 335

316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पढ़ा करते थे। समाज का महार बच्चा केवल मैं अकेला था। आज सिद्धार्थ कॉलेज में देखिए। दूसरों से हमारे बच्चों की पोषाकें अच्छी होती हैं। पहले साल सिद्धार्थ कॉलेज में केवल 15-20 ही अस्पृश्य बच्चे थे। आज देखिए, अस्पृश्यों के 300 बच्चे सिद्धार्थ कॉलेज में पढ़ रहे हैं।

दूसरी बात धर्म की है। इंसान को हमेशा स्वार्थसाधना ही नहीं करनी चाहिए, थोड़ा-बहुत परमार्थ भी उसे करना चाहिए। इसीलिए धर्म की जरूरत है। आप सबके लिए मैं यह कर रहा हूं। मुझे यह धर्म से मिली सीख है। पेट पाला तो सब कुछ हो गया ऐसा ना समझिए। पेट पालना कोई बड़ी बात नहीं, वेश्या भी अपना पेट पालती है। कबीर कह गए हैं, ‘कबीर कहे कूच उद्दम कीजे। आप खाए औरन और को दीजे।’ उनके कहे अनुसार कुछ काम कीजिए, खुद खाइए और औरों को भी खिलाइए। स्वार्थ और परमार्थ दोनों साध लीजिए। पहले घर संभालिए, फिर समाजकार्य में भी योगदान दीजिए। अपना घर उजाड़कर सामाजिक योगदान न दें।

एक लोहित नाम के ब्राह्मण ने बुद्ध से दो सवाल पूछे थे। पहला सवाल यह था कि विद्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्गों को ही पढ़ानी चाहिए। चौथे वर्ग को यानी शूद्रों को विद्या सिखानी नहीं चाहिए इस तत्व को तुम क्यों नहीं मानते हो? बुद्ध ने कहा - चार वर्ग बनाए गए हैं व्यवसाय की दृष्टि से। ज्ञान कोई रोजगार का सवाल नहीं है। जीवन के लिए ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। ज्ञान न होने के कारण अपना बहुत नुकसान होता है। उदाहरण देता हूं, नासिक में एक किसान के पास जमीन के कागजात थे। सब कुछ व्यवस्थित था। असल में उसे केस जीतना चाहिए था। लेकिन वकील द्वारा धमकाए जाने के कारण निर्णय उसके खिलाफ हुआ। किसान के अज्ञान के कारण यह हुआ।

भारत में जातिवाद बना रहा इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला कारण- सबको शस्त्र रखने की इजाजत नहीं थी। दूसरी वजह थी। अज्ञान। मैं अपने पूर्वजों को जम कर गालियां देता हूं कि उन्होंने अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का प्रतिरोध क्यों नहीं किया? लेकिन उसके लिए उपरोक्त स्थितियां ही कारण थीं।

‘तव्याचा जाय बुरसा, मग तो सहजच होय आरसा’ (तवे पर का मैल हट जाता है तो वह आईना बन जाता है।) इस न्याय के अनुसार अब हमें खुद अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। किसी और ने अगर सहायता नहीं भी की तो हमें अपने में खुद ही सुधार करना होगा। और अगर हम इस प्रकार सुधर जाएंगे तो औरों को हमें बुरा कहने का मौका ही नहीं मिलेगा। अपने ऊपर लगा कलंक हमें खुद हटाना होगा। मान लीजिए हमारे लोग पढ़-लिख गए। अफसर बने तो औरों को उनके मातहत काम करना ही पड़ेगा। अपनी और उनकी स्थिति एक-सी हो तब वे हमें नीचा मानेंगे ही नहीं।