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ये लोगो निश्चय के साथ अगर यह तय करें कि वे एकता से कार्य करेंगे तो मुझे यकीन है कि काँग्रेस सरकार ही नहीं और अन्य पार्टियां भी हमारे लोगों से डरेंगी।
हमने जो आरक्षित जगहें पाई हैं वे अस्पृश्य समाज के हित के लिए हैं। जिन लोगों को हमारे हित कीखातिर हमने संसद भेजा, जिन पर हमें भरोसा है, उन लोगों को क्या अस्पृश्य समाज के हित के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए ? गांधी से जो मेरा विरोध था या काँग्रेस और देश के लोगों का जो विरोध मैंने सहा है उसकी वजह एक ही है। वजह यही है कि, अस्पृश्य लोगों के हित में वे लोग कुछ नहीं कर सकते। सरकार ने और इस देश के लोगों ने हमारा कहना सुना, हमारी मांगें अगर मंजूर कीं तो विरोध की या लड़ने की कोई वजह बाकी नहीं रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं होता और हमें लड़ना पड़ता है।
अगर कोई राजनीति में आना चाहता है तो पहले उसे राजनीति के बारे में अच्छा अध्ययन करना होगा। पढ़ाई के बगैर दुनिया में कुछ भी कर पाना संभव नहीं है। हमारे समाज के हरेक कार्यकर्ता को राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक समस्याओं का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए। जो नेता बनना चाहते हैं उन्हें नेता के कर्तव्य-कर्म, नेता की जिम्मेदारियों का ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि, हमारे समाज के नेताओं पर बहुत बड़ी जिम्म्मेदारियां हैं। अन्य समाज के नेताओं-सी हमारे समाज के नेताओं की हालत नहीं है। अन्य समाज के नेता सभा में जाते हैं, लंबे-चौड़े भाषण देते हैं, तालियां बटोरते हैं और आखिरकार गले में माला पहनकर घर लौटते हैं। इतना ही काम अन्य समाज के नेताओं के आगे होता है। अपने समाज के नेताओं को इतना भर करके नहीं चलेगा। अच्छी तरह पढ़ना, सोचना, समाज की उन्नति के लिएखुद रात-दिन मेहनत करना यह हमारे नेताओं को करना पड़ेगा तभी वह लोगों का थोड़ा-बहुत भला कर पाएंगे। वही सच्चे नेता बन पाएंगे।
आपको लगता है नेता बनना बहुत आसान है। लेकिन मेरी मानो तो नेता बनना बहुत कठिन काम है।खुद मुझे नेता होना बहुत मुश्किल काम लगता है। मेरा नेता होना दूसरों की तरह नहीं है। जब मैंने आंदोलन छेड़ा तब किसी भी तरह का संगठन नहीं था।खुद मुझे ही सभी काम करने पड़ते थे। संगठन करना था तो मुझे ही करना पड़ता था। अखबार शुरू करना था तो वह भी मुझे ही करना पड़ा। इसीलिए, ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘जनता’ आदि अखबार मुझे ही चलाने पड़े। प्रेस चलानी थी तबखुद मुझे ही प्रेस चलाने की सारी तैयारी करनी पड़ी। संक्षेप में, मुझे हर बात का शून्य से निर्माण करना पड़ा। जो हुआ वह सब परिपूर्ण है ऐसा मेरा कहना नहीं है। मेरा कहना तो यह है कि जो हुआ वह जो होना चाहिए उसका शतांश भी नहीं है। अभी बहुत कुछ करना बाकी है। आगे राह बड़ी लंबी है जो हमें चल कर तय करनी है। अब तक जो भी हुआ है वह मानो आंदोलन का पौधा लगाया गया है। उसे सींच कर वृक्ष बनाना है।