324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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सच्चे और श्रेष्ठ धर्म की पुनःर्स्थापना करने का कठिन कार्य अब
भावी पीढ़ी के जिम्मे आन पड़ा है
मुंबई के जेवियर कॉलेज के मैदान पर दिनांक 24 जनवरी, 1954 को अखिल भारतीय साईं भक्त सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा, आज मूर्तिपूजा, साधुसंत और चमत्कार करने वाले व्यक्ति की पूजा ही धर्म बन गया है। अपने धर्म में अब न तो भगवान बचा है न रिश्ते बचे हैं। आज का समय मानव के पूरे अधःपतन का समय है। इसीलिए सच्चे और श्रेष्ठ धर्म की पुनर्स्थापना करने का कठिन काम भावी पीढ़ी पर आ पड़ा है।
साईबाबा से प्रत्यक्ष मिलने का या उन्हें देखने का मौका मुझे नहीं मिला है। उनके बारे में मैंने थोड़ा-बहुत सुन रखा है, बस इसीलिए आप अगर साईबाबा के बारे में जानने वाले व्यक्ति को बुलाते तो बहुत अच्छा रहता। साईबाबा के बारे में मेरा ज्ञान बिल्कुल शून्य है। और जितना जानता हूं वह भी केवल सुनी-सुनाई बातें ही हैं। साईबाबा को गुजरे जमाना बीत गया है फिर भी उनके भक्त में निरंतर बढ़ोतरी होती रही है। साईबाबा को एक धर्मगुरू के रूप में ही ज्यादातर लोग जानते हैं। भारत में धर्म में कई बदलाव आए हैं। पहले यही माना जाता था कि मनुष्य की आत्मा को मुक्ति दिलाने वाला साधन है, धर्म। समय के अनुसार से धार्मिक नजरिया, उद्देश्य और साधना आदि के कारण मूल धारणा में आमूलचूल बदलाव आया। धर्म के नैतिक मूल्यों का आदर करते हुए एक-दूसरे के लिए आदर भाव निर्माण कर विश्वबंधुत्व का निर्माण करने का साधन माना जाने लगा। धर्म की तीसरी स्थिति है मानवीय जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों की जो व्यक्ति पूर्ति करता है उसकी भगवान की तरह पूजा करना। किसी को सोना चाहिए था, किसी को संतान, कोई संकटों से मुक्ति चाहता था। फिर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला व्यक्ति भगवान बना। उसके बाद कुछ चमत्कार कर दिखाने वाले व्यक्ति की पूजा हो रही है यह भी आजकल हम देख रहे हैं।
कहना पड़ेगा कि धर्म के मामले में हम गलत राह पर निकल गए हैं। इतना ही नहीं, आजकल धर्म के नाम पर आजकल रुपया इकठ्ठा कर उसे गलत बातों परखर्च किया जाता है। दुनिया में आज दरिद्रता और दुख के होते हुए भी इस प्रकार धर्म के
जनता, 30 जनवरी, 1954