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नाम पर पैसा इकठ्ठा कर उसे ब्राह्मणों पर और उत्सवों परखर्च करना एक भयंकर अपराध है। गौतम बुद्ध ने इस सवाल पर कुछ उपाय बताए हैं। उन्होंने अपने नीतिशास्त्र में पंचशील, अष्टागमार्ग और निर्वाण के बारे में बहुत अच्छे ढंग से समझाया है। इनके अलावा उन्होंने अपने अनुयायियों को निम्नांकित दस तत्वों का अनुसरण करने के लिए कहा है - 1. प्रज्ञा, 2. शील, 3. नेखम्म, 4. दान, 5. वीर्य, 6.खन्ति, 7. सच्च, 8. अधित्थान, 9. मैत्री, 10. उपेख्खा।
प्रज्ञा अर्थात् जिससे अज्ञान का अंधकार नष् होता है वह - ज्ञानरूपी प्रकाश। शील यानी नैतिक विचार, कोई बुरा काम नहीं करना और अच्छा काम करते रहना। नेखम्म यानी भौतिक सुखों से अलिप्त रहना। दान यानी किसी प्रकार की अपेक्षा किए बगैर दूसरों के लिए तन-मन-धन अर्पण करना। वीर्य यानी धैर्य, कसौटी। शुरू किया गया काम बिना हारे पूरा करना।खन्ति यानी सहनशीलता। द्वेष का जवाब द्वेष से न देना। सच्चा यानी सत्य। हर कोई सत्य बोले, झूठ कभी न बोले। जो बोलो वह सत्य ही बोलो। अधित्थान यानी मनोनिग्रह। मैत्री यानी प्रेम - मित्र के लिए, दुश्मन के लिए, मानव मात्र के लिए हो अथवा प्राणिमात्र के लिए। उपेक्षा यानी उपेक्षा। मन जिसमें सुख-दुख से परे पहुंचता है और किसी भी परिणाम से विचलित नहीं होता और कर्तव्यपरायण बना रहता है। बुद्ध की उम्मीद थी कि ऊपर बताए में से अधिकाधिक गुण इंसान आत्मसात करे। इसीलिए पाली साहित्य में कहा गया है कि गौतम बुद्ध ने इस प्रकार ‘दान पारमिता’ भले सिखाई हो, दान सत्पात्री होना चाहिए यह उनका आग्रह था। दान देने के लिए दाता तैयार अगर हो भी तो दान जिसे दिया जाना है उसे उस बात से कमतरी महसूस नहीं होनी चाहिए। पददलितों को एक दिन अपने पैरों परखड़े रहने में समर्थ करे वही सच्चा दान है। साधू-संतों द्वार बताए गए तत्वों के अनुसार धन का विनियोग करना अत्यंत आवश्यक है। दरिद्रता, अज्ञान, रोग इतना है कि आज के युग में उसे नष् करने के लिए इस प्रकार पैसाखर्च किए बगैर उसे धनिकों परखर्च करना गलत साबित होगा। उन पैसों का उपयोग अस्पतालखोलने, शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करने, बेकारी दूर करने के लिए छोटे-छोटे व्यवसायों का निर्माण करने, गरीब और अनाथ महिलाओं के लिए पेट पालने के व्यवसाय का प्रशिक्षण उपलब्ध करने पर किया जाए। जमा रकम का उपयोग अगर इस प्रकार किया जाए तो उसे अपने काम की वाहवाही होगी। इतना ही नहीं तो साईबाबा की कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती रहेगी।