314 31-1-1954 आज देश में नैतिकता बची ही नहीं है, जिस देश की कोई नीतिमत्ता नहीं उसका भविष्य संकटमय है - मुंबई - Page 345

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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आज देश में नैतिकता बची ही नहीं है,

जिस देश की कोई नैतिकता नहीं उसका भविष्य संकटमय है

मुंबई के फेमस स्टुडियो में रविवार दिनांक 31 जनवरी, 1954 के दिन आचार्य अत्रे की ‘महात्मा फुले’ फिल्म का मुहरत समारोह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे डॉ. बाबासहब अम्बेडकर औरखास आशिर्वाद देने के लिए सातारा से कर्मवीर भाऊराव पाटील आचार्य अत्रे के आमंत्रण को स्वीकार कर आए थे।

आचार्य आयु. अत्रे ने उपस्थित मेहमानों के प्रति धन्यवाद करते हुए कहा, ‘मुझे बहुत

खुशी है कि, ज्योतिबा फुले का क्रांतिकारी जीवन रुपहले पर्दे पर साकार करने का मेरा पुराना सपना आज साकार हो रहा है। पुणे शहर के जिस हिस्से में करीब 100 साल पहले फुले ने काम किया उसी हिस्से में मैं कई वर्षों तक रहा। इसलिए, उनके काम का और परंपरा का मेरे मन पर गहरा असर हुआ है। सबसे बड़ीखुशी की बात यही है कि इस फिल्म की शुरुआत डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के हाथों हो रही है। महात्मा फुले दर्शन के सबसे बड़े अनुयायी अगर कोई हैं तो वह केवल डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ही हैं। राजनीति की, धर्म के क्षेत्र की, सामाजिक विषयों की डॉ. अम्बेडकर की भूमिका पूरी तरह से क्रांतिबा फुले जैसी ही है। इसीलिए क्रांतिबा फुले के बारे में उस युग में जो गलतफहमियां पैदा हुईं वही गलतफहमियां आज डॉ. अम्बेडकर के काम को लेकर पैदा हो रही हैं। रयत शिक्षण संस्था के संस्थापक कर्मवीर भाऊराव पाटील इस पिल्म को आशिर्वाद देने के लिए आज यहां उपस्थित हैं।

आज के दिन की यह दूसरी बड़ी बात है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन महात्मा फुले दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए अर्पण किया है।’

‘अंग्रेजी में फुले का जीवन परिचय लिखने की डॉ. अम्बेडकर की इच्छा है यह मैं जानता हूं। लेकिन साधनों के अभाव में यह काम अधूरा पड़ा है। मेरा काम पूरा होने के बाद सारा सामान उनके हवाले करने का मेरा इरादा है। फुले के जीवन के बारे में जनसामान्य के बीच अज्ञान फैला हुआ है। इस फिल्म के सहारे फुले के जीवन के बारे में लोगों को पूरी जानकारी देने की मेरी कोशिश रहेगी।’

जनता, 6 फरवरी, 1954