332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उनके बाद डॉ. बाबासाहेबखड़े हुए और एक बार फिर उपस्थित दो लाख के जनसमुदाय ने उनकी जयकार की। उन्होंने करीब डेढ घंटे तक भाषण दिया।
उन्होंने कहा जिन दो लोगों को संसद में भेजना है उनमें से एक मैं हूं। मैं उम्मीदवार बन करखड़ा हूं। मुझे चुनावों मेंखड़े रहने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मैं पहले ही ऊपर की लोकसभा अर्थात् राज्यसभा का सदस्य हूं।खेद की बात यह है कि मैंने देखा है कि इस उच्च सभा यानि राज्यसभा में कोई कामकाज नहीं होता। केंद्र सरकार की लोकसभा की बैठकें बारंबार लेकर उससे लोकहित का कामकाज करवाने की इच्छा नहीं है।
इसीलिए आखिर मैंने संसदीय चुनावों मेंखड़े होने का निर्णय लिया।
दो जगहों के लिए चार उम्मीदवारखड़े होने के कारण स्पष्ट है कि चुनावों में कांटे की टक्कर होने वाली है। अपना वोट किसे देना चाहिए इस बारे में निश्चित तौर पर बताने के लिए मैंने यह दौरा शुरू किया है। सेहत के कारण हर जगह जाना मेरे लिए संभव नहीं है, इसलिए गिने चुने स्थानों पर जाकर ही मैं अपना चुनाव प्रचार करने वाला हूं। किन्हीं कारणों से आज जो लोग यहां उपस्थित नहीं हैं उन तक आप मेरी बात पहुंचाएंगे ऐसी मुझे उम्मीद है।
संसद के 500 में से 400 सदस्य कांग्रेस के हैं। ऐसी स्थितियों के बावजूद हरेक चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवारखड़ा होता है तब उसका विरोध करना प्रजातंत्र के लिए लज्जास्पद है। वे चुनाव लड़ते हैं मारवाडि़यों के पैसों के बल पर। कांग्रेस ने दो उम्मीदवार चुनाव में उतारे हैं। उनका उद्देश्य क्या है? कांग्रेस वाले बताते हैं कि नेहरू के हाथ मजबूत करने के लिए इन्हें जिता कर संसद में भेजिए। लेकिन क्या नेहरू इस प्रकार का समर्थन पाने के हकदार हैं? इस बारे में जरूर सोचना पड़ेगा।
आजादी के बाद सात सालों की मियाद मिली। इतने समय में कर्तव्यपरायण पुरुष आसमान धरती पर ला सकते हैं। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने क्या किया? हमने अंग्रेजों से आजादी की मांग क्यों की? अंग्रेजों के राज में जो अनेक समस्याएं पैदा हुईं थीं उन्हें हम हल करेंगे ऐसा तब इन नेताओं का कहना था। आज का प्रमुख मुद्दा विषमता का है लेकिन इस बारे में कोई बोलता तक नहीं। वैसे देखा जाए तो हमारा देश दो हिस्सों में बंटा है। एक हिस्सा ऊंचे लोगों का और दूसरा छोटे लोगों का है। सभी मंत्री उच्च वर्ग के हैं। एकाध अपवाद हो सकते हैं। आम लोगों को आजादी का रत्तीभर फायदा नहीं मिला है।
पिछले साल एक सभा का उद्घाटन करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने बताया कि मेरी नजर में अस्पृश्यता सामाजिक समस्या है ही नहीं। वे मजदूर हैं और अन्य मजदूरों के साथ उनकी समस्याएं भी हल हो जाएंगी। लोकलाज कीखातिर ही सही गांधीजी कहा करते थे कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का कलंक है और उसे धोना पड़ेगा। ये (नेहरू) इतना तक नहीं कहता।