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प्रशंसकों की ओर से पांच हजार रुपयों की थैली डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को अर्पण की गई। इस अवसर पर शे. का. फेडरेशन के उपसचिव आयु. पी. एन. राजभोज, गुजराथ के आयु. परमार, महाराष्ट्र के आयु. गायकवाड़, मराठवाड़ा के आयु. बी. एस. मोरे के भी सभा में भाषण हुए।
उनके बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण हुआ। उन्होंने कहा-
बहनों और भाइयों,
भंडारा जिले के इस हिस्से में मैं चुनाव-प्रचार के दौरे पर आया हुआ हूं। यह हिस्सा चुनाव क्षेत्र में शामिल नहीं है, लेकिन कुछ लोगों ने मुझे आश्वासन दिया है कि यहां से 5000 रुपये की थैली (सहयोग राशि) अर्पण की जाने वाली है। यहां के कार्यकर्ताओं ने बताया कि पहले 2000 रुपए दिए हैं और अब 1500 रुपए अर्पण किए जाएंगे। ऐसे अवसर पर चुनावों के बारे में कुछ बताना अप्रासंगिक है। लेकिन जिस विषय पर मैं बोलने वाला हूं वह महत्वपूर्ण है।
1952 में हुए चुनावों में सभी हिस्सों में फेडरेशन की हार हुई। तब काँग्रेस को बहुतखुशी हुई। इस बार काँग्रेस के खिलाफ लड़ने वाला दल एक ही था। केवल अन्य फेडरेशन पार्टियां अपनी भूमिकाएं भूल गईं। हम चुनाव हारे तब कुछ लोगों ने मुझसे कहा, अम्बेडकर को चाहिए कि इस पार्टी कोखत्म कर दे औरखूंटी से टांग दें। क्योंकि इस पार्टी में कोई दम नहीं है। बाहर के लोगों की तरह ही हमारे बीच के कुछ लोग भी यही कहते थे। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता, अभी हुई कुछ सभाओं में से जो 2-3 लाख से अधिक लोग इकठ्ठा हुए हैं उससे फेडरेशन की जरूरत साफ तौर से समझ में आती है। (तालियां) फेडश्रेष्ठान की क्या आवश्यकता है यह जानने के लिए आज की स्थितियों में देश का कामकाज किस प्रकार चल रहा है यह जानना जरुरी है। इंग्लैंड में जब कोई पार्टी सत्ता में आती है तब वह सभी लोगों के साथ समभाव से पेश आती है। कन्जर्वेटिव पार्टी अगर सत्ता में हो तो लाइसेंस और ग्रांट देते हुए वह व्यक्ति किस राजनीतिक पार्टी का है इस बात पर अधिकारी वर्ग बिल्कुल गौर नहीं करता है। यही नीति अन्य देशों में भी है। लेकिन भारत के शासक अन्य पार्टियों के बारे में बिल्कुल लापरवाह हैं। जिन लोगों ने छोटी-बडी संस्थाएं चलाई हैं उन्हें मैं जो कह रहा हूं उस प्रकार के कटु अनुभव हुए होंगे। अंग्रेजों के राज में अधिकारी वर्ग किसी के भी बारे में मन में बिना कोई गांठ पाले न्याय करता था, लेकिन आज सफेद टोपी पहनने वाला काँग्रेस का बगुला जिले का मानो राजा है। वह किसी व्यक्ति को लेकर न्यायाधीश के पास जाता है और उसके बारे में सिफारिश करता है। उसने अगर नहीं सुनी तो वह मिनिस्टर के पास जाता है। न्यायाधीश अगर ईमानदार हुआ तो उसकी नौकरी तो गई समझिए।
इन सभी बातों का एक ही कारण होता है। इस देश में सत्ता पार्टी पर अंकुश रखने