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आज भी आदिवासी जंगली युग में ही जीते हैं देश को आजादी
मिलने से उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आया
भंडारा में होने वाले संसदीय उपचुनावों के प्रचार कार्य के लिए दि 29 अप्रैल, 1954 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर चंद्रपुर जिले के वडसा गांव आए। वहां की सभा में उन्होंने कहा-
आपने अस्पृश्यों के लिए क्या किया? इस सवाल का जवाब देते हुए वहां की प्रचंड चुनाव सभा में बबासाहब ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से अस्पृश्यों के लिए जो शैक्षिक सहूलियतें उपलब्ध करवाई थीं उनका जिक्र किया और बताया कि लेविन कमिशन के अनुसार हर साल शिक्षा पाने के लिए विदेशों में भेजे जाने वाले छात्रों की कुल संख्या में से साढ़े बारह प्रतिशत अस्पृश्य छात्रों का चुनाव का प्रबंध किए जाने की बात बताई। उन्होंने आगे कहा, ‘भज्ञरत में अस्पृश्यों के बारे में जो बातें कभी नहीं हुआ करती थीं वे अब हो रही हैं। इस बारएक साथ 16 छात्रों को शिक्षा पाने के लिए विदेश भेजा जा रहा है।’
प्रजातंत्र में लोगों के प्रतिनिधि के तौर पर जब कोई अधिकार और जिम्मेदारी के ओहदे पर स्थानापन्न होता है उसके दोषों को जाहिर कर और उसके कारण होने वाली गलतियों को टाल कर अर्थात् कि देश का कल्याण करने का कर्तव्य हर नागरिक को पूरा करना होगा। इसके लिए सही ढंग से समीक्षा करने का हक हर नागरिक को प्राप्त हुआ है। नेहरू कोई चमत्कारी पुरुष का अवतार नहीं हैं। अधिकार और जिम्मेदारी के ओहदे पर आसीन व्यक्ति की गलतियां दिखाने के लिए मैं उसके काम की समीक्षा करूंगा।‘‘ संविधान परिषद के समय के अपने विभिन्न अनुभव बताते हुए बाबासाहब ने अपनी राजनीति के बारे में विचार कितने गहरे हैं यह लोगों को बता दिया। संविधान परिषद के दौरान के अपने अनुभव बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि लोगखुद पहचान लें कि हममें से राजा भोज कौन है और गूगा तेली कौन है। कश्मीर के बारे में कहा, हमारे प्रधानमंत्री भारत के भविष्य की जगह अगर कश्मीर के मोह में ही पंसे रहना चाहते हैं तो वे प्रधानमंत्री का पदखाली कर बेशक कश्मीर के राजा बन जाएं।
आखिर में उन्होंने कहा, आदिवासी अभी भी जंगली युग में ही हैं। आजादी के कारण उनके जीवन में किसी भी तरह का बदलाव नहीं लाया गया है। सर्वोदय की कल्पना कवि मुक्तेश्वर द्वारा वर्णित शुक्राचार्य की सृषि् की प्रतिसृषि् ही है।
दैः तरुण भारत, नागपूर. 2 मई, 1954