340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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व्यवहार और सिद्धांत में तालमेल न हो तो वरिष्ठ वर्ग के विनाश
में देर नहीं लगेगी
2 मई, 1954 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में यूथ एसेंब्ली का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा-
पिछले कई सालों से मैं छात्र आंदोलनों का निरीक्षण कर रहा हूं और मेरे ध्यान में आया है कि शिक्षा के मसलों पर या छात्रों की मुश्किलों की ओर किसी भी छात्र परिषद ने ध्यान नहीं दिया है। छात्रों की अलग-अलग संस्थाएं विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के पहियों से बंधी रहती हैं। इतना ही नहीं वरन् कुछ छात्र संगठन कम्युनिस्ट देशों के साथ तो कुछ संगठन जनतंत्रवादी राष्ट्रों को समर्थन देने के लिए ही पैदा हुए हैं ऐसा मुझे लगता है। इसलिए शिक्षा के मसलों पर ध्यान दिए बगैर केवल विवादों में लगे रहते हैं और बहक कर किसी और दिशा में चले जाते हैं।
स्वतंत्रता, समता और मातृभाव के बारे में हमखूब कहते हैं, इतना ही नहीं इन तीन बातों पर हम लंबे व्याख्यान भी दे सकते हैं। लेकिन इन तीनों में से एकाध ही सही हमारे भारतीय समाज में है कि नहीं इस बारे में सोचने का हमारे मन में नहीं आता। जैसे मानों सिद्धांत और व्यवहार के बीच सामंजस्य बिठाना हमारी जिम्मेदारी ही नहीं हो।
भारत की बहुसंख्य जनता अज्ञान और भोली कल्पनाओं में घिरी है। यहां की समाज रचना ही गलत कल्पनाओं को जन्म देती है। इसीलिए व्रत रखना, मनौती मानना, भगवान और भोंदूबाबा की शरण जाना ही धर्म करना है ऐसा इन लोगों को लगता है। जनता को इन सभी मूर्ख कल्पनाओं से छुटकारा दिलाना होगा। छात्र आंदोलन में शामिल होकर जनता का अज्ञान और गलत धारणाएं दूर करें। तभी हमारी शिक्षा का जनता को कुछ तो लाभ मिलेगा। हमें अपने ज्ञान का केवल परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए इस्तेमाल नहीं करना है। हमें अपने ज्ञान का उपयोग कर अपने बंधु-बांधवों में सुधार लाना है, उनकी सम्पूर्ण प्रगति के लिए इस ज्ञान का इस्तेमाल करना है। तभी भारत की उन्नति होगी।
दुनिया की कई जटिल समस्याएं हल नहीं हुई हैं। मनुष्य लगातार उन्हें हल करने की कोशिश में लगा हुआ है। इसीलिए विभिन्न सिद्धांत बनाए जाते हैं, हमारे सामने आज कार्ल मार्क्स एक सवाल बन करखड़ा है। हमें सोचना है कि आज की समस्याओं को
प्रबुद्ध भारत, जयंती विशेषांक, 14 अप्रैल, 1956