323 26-10-1954 आपकी कुटिया साबुत बची तो लोग आपकी शरण में आएंगे - मुंबई - Page 365

346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

काँग्रेस का विरोध करना ही हमारा काम तय हुआ था। उन्हीं के कारण हमारे अधिकारों पर गाज गिर रही थी। तब से शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन टिका हुआ है। शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन पत्थर का लेकिन मजबूत किला है। काँग्रेस का किला पैसों परखड़ा है। बालगंगाधर तिलक फंड और गुजराती बंधुओं की थैलियों की मदद पर यह किला

खड़ा है। लेकिन शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन का किला अस्पृश्य जनता की भावनाओं पर

खड़ा है। मेरी इच्छा है कि यह किला टूटना नहीं चाहिए। पिछले दस सालों से शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन की ओर मेरा ध्यान नहीं रहा। 10 साल की इस गैरहाजिरी में शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन में बहुत अधिक मतभेद निर्माण हुए हैं। इससे पूर्व इस तरह के मतभेद नहीं थे। हर आदमी द्वारा फेडश्रेष्ठान में गुटबाजी की जा रही है। हरेक ने अपने अपने छोटे-छोटे गुट बना लिए हैं। हर गुट दूसरे का वर्चस्व बरदाश्त नहीं कर पाता। इसीलिए मैं कहता हूं कि हमारे लोग अभी राजनीति में मंजे नहीं हैं। राजनीति क्या है यह वे ठीक ढंग से नहीं जानते। हमारे समाज में आपसी मतभेद बहुत ज्यादा होते हैं। वे तुरंतखत्म भी नहीं होते। मतभेदों के पेड़ उनके पेटों में बढ़ने लगते हैं। उनके मतभेद उनके बच्चों के पेट में भी बढ़ने लगते हैं। इस प्रकार मतभेद बढ़ते ही जाते हैं। हम लोगों में यह गुणधर्म बड़े पैमाने पर है। काँग्रेस जैसी पार्टी में भी मतभेद हैं। साथ ही उनके पास कुछ अच्छे गुण भी हैं यह अनुभव के कारण कहना पड़ता है। उनका एक गुण बहुत महत्वपूर्ण है और वह है बहुमत द्वारा जो बात तय होती है उसे वे मानते हैं। उस बात के विरोधी भी फिर उस बात का समर्थन करने लगते हैं। राजनीति में यह गुण बहुत आवश्यक है। मेरी राय में, अगर काम चल निकले तो ही मैं संस्था में रहूंगा, यह मानसिकता बहुत बुरी है। हम करे सो कायदा वाली मानसिकता नहीं होनी चाहिए।

संस्था में बड़ा कौन? डॉ. अम्बेडकर के बाद कौन? आदि मतभेद बहुत बढ़ चुके हैं। दलित फेडरेशन की सभाएं नहीं होतीं। इलेक्शन नहीं होते, आदि बातें मैं हमेशा कार्यकर्ताओं से सुनता रहता हूं। यह सब सच होने के बावजूद क्या, उन्होंने इस बारे में कुछ सोचा है? इस बात के लिए जजरी पैसा हमारे पास नहीं है। इसलिए परिषद का आयोजन करना, इलेक्शन करना हमारे लिए संभव नहीं है। आयु. भोले अगर हमें रुपया मुहैय्या कराएंगे तो सालभर में क्यों, हम हर छह माह में परिषदों का आयोजन किया करेंगे। उसके लिए पैसे देकर भोले पुणे में बैठक बुलाएं। काँग्रेस जैसी संस्था के पास पैसा है। हमारे पास पैसों की कमी है। कुछ लोगों का कहना है कि हमें सरकार की आलोचना नहीं करनी चाहिए। उनको सहयोग देना चाहिए। हमें अपने हक हासिल करने हैं। यही हमारा पहला काम है। वे अगर हमारी झोली में नहीं आते हैं तो हम आलोचना करेंगे ही। सरकार की आलोचना ही नहीं करनी हो तो दलित फेडरेशन की आवश्यकता भी होगी क्या ? सरकार क्या चीज है, भगवान भी अगर हमारे सामने आएं तो भी हम उसपर टीका-टिप्पणी करेंगे ही। जिन्हें यह बात पसंद नहीं है वे इत्मीनान से फेडरेशन