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छोड़कर जा सकते हैं। क्या हमने सरकार से सहयोग नहीं किया ? मैं क्या चार सालों तक उनके साथ नहीं था? हम समय-समय पर उन्हें सहयोग देते आए हैं। सरकार अगर हमारे लिए कुछ नहीं करने वाली है तो हम हमेशा उसकी आलोचना करते रहेंगे। हम क्यों चुप रहें?
लोग कहते हैं कि शे. का. फेडरेशन आक्रोश व्यक्त नहीं करता। हमला यानी क्या? आक्रोश व्यक्त की राजनीति क्या हम निभा पाएंगे? हमने अगर आक्रोश व्यक्त किया तो उससे आपको ही दिक्कतें आने वाली हैं। हम अगर कारागार में जाकर बैठे तो लोग आपको ही परेशान करते रहेंगे। अम्बेडकर की सहायता करते हो बच्चू? तुम्हें देख लेंगे, कह कर आपको परेशान करने लगेंगे। इससे बेहतर है कि आप कष् करें। कष् करना मेरा तो धर्म ही है। मुझे अभी तक आराम नहीं मिला है और मैं आराम करता भी नहीं। दूसरी बात यह, कि अपना मन साफ होना चाहिए। उससे आपसी मतभेदखत्म होते हैं। शे. का. फेडरेशन में प्रमुख विवाद इस बात को लेकर है कि अम्बेडकर के बाद कौन? मैं इसका मतलब ही समझ नहीं पाया हूं। मेरे मरने से पहले ही यह विवाद पैदा हुआ है। इसलिए मेरे सामने अब यह सवाल पैदा हुआ है कि मुझे जल्द ही मर जाना चाहिए कि मुझे जिंदा रहना चाहिए? यह विवाद तो मिटाना ही होगा। मैंने इसका एक इलाज ढूंढ़ निकाला है। इस विवाद को मिटाने के लिए शे. का. फेडरेशन के नेताओं और सदस्यों के चुनाव होने चाहिए। तभी यह विवाद मिटेगा। जो काम करता है वही सच्चा नेता होता है। सच्चा नेता कौन है यह लोग जानते हैं। इस पद्धति पर अमल करने के लिए हमें चार आने का चंदा नहीं चाहिए। शे. का. फेडरेशन में पैसाखाने की मनोवृत्ति बहुत पनपी है। इसीलिए, काँग्रेस की तरह हमें चार आने का बंधन नहीं चाहिए। हर अस्पृश्य समाज का स्त्री-पुरुष, बच्चा शे. का. फेडरेशन का सदस्य है। वह कहे या न कहे हम ऐसा ही मानते हैं। इस प्रकार हर गांव के लोग अपने गांव से पांच लोगों को चुनें। इस प्रकार सभी तहसील के गांवों के पांच के हिसाब से लोग अपने अध्यक्ष, सचिव आदि का चुनाव करें। इससे शिकायत का मौका ही नहीं मिलेगा। यह चुनाव सब पर लागू रहेगा। जितना पैसा इकठ्ठा होगा उसे बैंक में रखा जाएगा।
लोगों के लिए जो कष् उठाते हैं वही नेता बनते हैं। लोग यह बात जान जाते हैं, इसलिए काम करना होगा। मैं अब राजनीति से बाहर निकलने वाला हूं। मैं अब केवल सलाह-मशविरा देने वाला हूं। इसके लिए मैं हमेशा तैयार हूं। मेरी इच्छा है कि मैं भले शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन से बाहर निकला तब भी फेडरेशन को जिंदा रखना होगा। यह नहीं समझना कि इलेक्शन में आपकी पूछ नहीं है। ऐसा भी नहीं कि हम इलेक्शन जीत ही लेंगे। किदवई मेरा दोस्त था। वह काँग्रेस का प्राण था। उसके बाद काँग्रेस अनाथ हो गई है। उनकी ही तरह जवाहरलाल नेहरू भी काँग्रेस के प्राण हैं। उनके बाद काँग्रेस