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करने लगे। वे कहते, यह बच्चा मां के लिए बुरा है। आखिर हमारी मां जल्द ही गुजर गई। मेरे जन्म के बारे में इस प्रकार तीन बातें बताई जा सकती हैं।
मेरे बचपन के बारे मेंखुद मुझे बड़ा आश्चर्य महसूस होता है। मेरे 12-13 साल का होने तक सभी लोगों को पूरे यकीन के साथ लगता था कि यह बच्चा अपने कुल के लिए कलंक साबित होगा। यह कुछ नहीं कर पाएगा। क्योंकि, मेरे बारह-तेरह साल के होने तक लंगोट के अलावा कोई कपड़ा नहीं पहनता था। (हंसी) साथ ही हर घर के दरवाजे पर जाकर पूछता था कि - क्या आपके घर की लकडि़यां तोड़नी हैं? पहले शिक्षा में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। मां के गुजर जाने के बाद मेरी बुआ ने मेरा लालन-पालन किया। मुझे लगता था, पढ़ कर करूंगा क्या? छह महीनों तक मैंने माली का व्यवसाय किया। मिलिट्री कैंप में बाग हुआ करते थे। वहां के माली के बेटे से संगत की। मिट्टी-पत्थर उठाए। जमीन साफ की। नल से बाग को पानी देना था, लेकिन वह मुझसे नहीं हुआ। तब मैंने घर के ऊपर लगे सारीखपरैलें निकालीं और उनसे नालियां बना दीं। अब लगता है कि क्या थी मेरी जिंदगी भी।
जब हम सातारा में थे तब अन्य सुबेदार नाईक भी थे। उनके घरों के आगे एक कूड़ेदान था। गोबर-कूड़ा उसमें पड़ा रहता। उस कूडेदान के किनारे एक गूलर का पेड़ था। मैं पेड़ पर चढ़ने में एकदम निपुण था। बंदर भी शायद पेड़ पर इतनी जल्दी नहीं चढ़ पाते होंगे। अब मेरे पैर कमजोर हो गए हैं। मैं उस पेड़ पर चढ़ता और कंबल बिछा कर सो जाता। मन भर जाता तो ऊपर से ही कूडेदान में बिखरी राख में छलांग लगा कर उतरता। उस वक्त सातारा में प्लेग फैला हुआ था। लोग कहते कि कई लोग प्लेग से मरे लेकिन इसको पता नहीं क्यों प्लेग नहीं होता। ऐसा मेरा हाल था। एक बार कसाई तीन रुपयों में बकरी देने के लिए तैयार नहीं था। तब हमने वसूली की और तीन रुपयों में दो बकरियां लेकर आए। तब हम लंबे बांस लेकर बकरियों को चारा खिलाते थे। किसी ने बताया कि ये बकरियां सींगवाली हैं, सींगवाली बकरियां अच्छी नहीं होतीं, बिना सींग वाली बकरियां अच्छी होती हैं। मेरा बचपन ऐसा ही बीता। उस समय इस व्यवस्था में अंधविश्वास कूट-कूटकर भरा पड़ा था।
घर में कई लोग मेरे लाड़ करते। मेरी बुवा का मैं बहुत ला़ला था। उसने सबको हड़का कर रखा था। ‘बिन मां का बच्चा है, उसे डराया धमकाया मत करो’ इसीलिए, मैंने मिली आजादी का पूरा फायदा उठाया। सबको यही लगता था कि इस बच्चे के हाथों कुछ अच्छा नहीं होने वाला। आज अगर मेरा यह सब देखने के लिए वे यहाँ होते तो कितना अच्छा होता। इस प्रकार मेरा बचपन गुजरा। आप अब समझे होंगे कि फिर मेरे जीवन में कितनी क्रांति आई। मैं अगर चरवाहा बनता या मेहनत-मजदूरी का काम करता तो आज इस पद तक नहीं पहुंच पाता। मेरे पिताजी हमेशा मुझसे कहा करते थे।