352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अच्छा काम सीखो। इन सारी यादों को बटोर कर एक चरित्र लिखने का मेराखयाल है। (तालियों की गड़गड़ाहट) लेकिन चरित्र नहीं एक छोटी-सी किताब लिख रहा हूं, ‘माझं बालपण’ (मेरा बचपन), उसमें ये सारी बातें मैं विस्तार से लिखूंगा।
ऐसी कोई बात नहीं कि मुझमें कुछ गुण पैदाइशी थे और इसीलिए मैं इस पद तक पहुंच पाया। मेरा जीवन जिस प्रकार चल रहा था उसी प्रकार अगर चलने दिया होता तो मैं एक नीतिपरक आदमी बनता। लेकिन मुझे अपनी याद थी। मेरी जिंदगी में जो मोड़ आया वह क्यों आया, कैसे आया इसकी वजह मैं बताने वाला हूं।
मेरे तीन गुरू हैं। हरेक के गुरु तो होते ही हैं। मेरे भी हैं। मैं कोई संन्यासी अथवा बैरागी नहीं हूं। मेरे गुरु हैं। मेरे पहले आदर्श हैं बुद्ध। मेरी उम्र दस-बारह साल की हुई होगी उस समय मेरे पिताजी कबीरपंथी साधु थे। मुझे यह तभी से याद है। मेरे पिताजी का घर धर्मासन कहा जा सकता है। विद्यासन भी कहा जा सकता है। मेरे पिताजी विद्या के भक्त थे और धर्म के चहेते। मेरे बचपन में रामायण-महाभारत आदि सभी ग्रंथ उन्होंने मुझसे रटवा लिए थे। उनके अभ्यास करवाते थे। रामायण-महाभारत पढ़ कर मेरे मन पर बहुत गहरा असर हुआ। मेरे पिताजी मुझसे कहते, ’हम गरीब हैं इसलिए डरने की कोई बात नहीं है। तुम विद्वान जरूर बनोगे, क्यों नहीं बनोगे?’ एक बार मैंने कोई परीक्षा पास की थी। उस वक्त चॉल के लोगों ने मेरे पिताजी की इच्छा न होते हुए भी केलुस्कर की मदद लेकर मेरा सम्मान करने का कार्यक्रम रखने की सोची। मेरे पिताजी कहते, नहीं कराना है सत्कार। बच्चों का सत्कार करो तो उन्हें लगता है कि वे नेता बन गए हैं। (हंसी और तालियां) लेकिन तब मेरा सत्कार हुआ। और दादा केलुस्कर ने मुझे बुद्ध के चरित्र की एक किताब भेंट में दी। उस चरित्र को पढ़ने के बाद मुझमें एक अलग ही प्रकाश ने जन्म लिया। हनुमान, सीता, राम वनवास गए। धोबी के कहने पर सीता का त्याग किया, कृष्ण की सोला हजार पत्नियां आदि बातें कुछ भयंकर ही लगीं। ये बातें फिर मेरे मन में जड़ें ही नहीं पकड़ पाईं। लेकिन बुद्ध धर्म के बारे में अध्ययन के बाद आज तक मेरे मन पर पकड़ है। मुझे पक्के तौर पर लगने लगा है कि दुनिया का कल्याण केवल बुद्ध धर्म ही कर पाएगा। हिंदू लोगों को अगर अपना राष्ट्र जिंदा रखना हो तो बौद्ध धर्म को ही स्वीकारना होगा यह मैं हमेशा कहता आया हूं।
मेरे दूसरे आदर्श हैं कबीर। मेरे पिताजी कबीर पंथी थे। सो कबीर के जीवन और दर्शन का मुझ पर बड़ा गहरा असर हुआ। मेरी राय में कबीर को बुद्ध के दर्शन का सही मतलब समझ आया था। मैंने किसी को बड़ा नहीं कहा है। गांधी को मैंने कभी महात्मा नहीं कहा। गांधी हमेशा छल-कपट में विश्वास करते थे। क्योंकि कबीर ने कहा है - मनुष्य होना कठिन है! तो साधु क्या बनें! जो इंसान नहीं बना वह महात्मा कैसे बनेगा?
और मेरे तीसरे आदर्श हैं ज्योतिबा फुले। ब्राह्मणेतरों के सच्चे गुरु वही हैं। दर्जी,