324 28-10-1954 तीन गुरु और तीन उपास्य आदर्शों की कृपा से मेरा जीवन बना है - मुंबई - Page 372

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कुम्हार, नाई, कुर्मी, माली, मछुआरे, मानंग, चमारों को इंसानियत के पाठ उन्होंने ही पढ़ाए हैं। पुरानी राजनीति में हम ज्योतिबा की राह से ही जा रहे थे। आगे चल कर मराठा हमसे अलग हुए। कोई काँग्रेस में जूठनखाने गया। उन्हीं में से हमारे रा. ब. बोले हिंदू महासभा में गए। वह यहां उपस्थित हैं ही। कोई कहीं भी जाए, लेकिन हम ज्योतिबा की राह पर ही चलेंगे। साथ में कार्ल मार्क्स को लेंगे या किसी और को लेकिन ज्योतिबा का मार्ग नहीं छोडेंगे। इस प्रकार ये मेरे तीन जीवन आदर्शों के हैं। इनकी सीख से मेरा जीवन बना है।

इनके अलावा मेरे तीन उपास्य प्रेरणा भी हैं। किसी के मरीआई,खंडोबा जैसे भगवान होते हैं मेरे भी तीन भगवान हैं। मेरी पहली प्रेरणा है विद्या। विद्या के बगैर इंसान को शांति या इंसानियत मिलना संभव नहीं है। विद्या सभी को मिलनी चाहिए। वह महासागर की तरह है। बुद्ध ने एक बार कहा है कि बुद्ध धम्म शुद्ध धर्म है। यहां भेदभाव नहीं है। श्रमण, भिक्षु, ब्राह्मण, भंगी सब एक हैं। मेरे संघ में आने से पूर्व उनका जो भी नाम रहा हो। सब एक हैं। नाम चाहे जो हो - नदी, नाला, यमुना हो, ब्रह्मपुत्रा हो, गंगा हो, गोदावरी हो, सभी नदियां अपने उदगम से निकल कर सागर में जाकर मिलीं। सबका पानी जब मिल गया तब यह बता नहीं पाएंगे कि यह गंगा का पानी है या गोदावरी का। मेरा संघ महासागर की तरह है। यहां जाति-पांति नहीं। आप सभी एक हैं।

आपकी विद्या पाने की चाह है तो उसे सफल कीजिए। जिस प्रकार इंसान को अगर जिंदा रहना हो तो उसे अनाज की जरूरत होती है उसी प्रकार उसे विद्या की जरूरत होती है। ज्ञान के बगैर वह क्या कर सकता है? ब्रह्मदेश में 90 प्रतिशत लोग सुशिक्षित हैं। आज भारत में 90 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। ब्राह्मणों ने हमें विद्या नहीं दी, इसीलिए ऐसा हुआ है। धर्म के कानून ने हमारी शिक्षा की राह में रोड़े अटकाए। हमारी विद्या छीन ली। हमारे लोग समझते कि पत्थर ही विद्या है, इसीलिए हमारी धार्मिक मान्यताएं नीचे लुढ़कती गईं। पत्थरों की पूजा करने वाले भक्त हममें हर जगह हैं। तुकाराम ने एक जगह कहा है इसका अर्थ यह हुआ कि अगर भगवान को गंगा उपवास करके S\kC 354— ————————— इसी से संतान हुआ करती तो उसे शादी करके या पती की क्या जरूरत ही नहीं पड़ती। ‘नवस सायासे कन्या-पुत्र होती, तरी कासया करणे लागे पती! इसकी वजह है। उनके पास विद्या नहीं थी। विद्या बहुत बड़ी चीज है। मुझे विद्या के प्रति पागलपन की हद तक लगाव है। ब्राह्मणों के घरों में नहीं होंगी उतनी किताबें आज दिल्ली के मेरे घर में हैं। मेरे पास कुल 32,000 किताबें हैं। किसी ब्राह्मण के पास इतनी किताबें? दिखा दें वो। ठाकुर एंड कंपनी के हजारों रुपयों की उधारी के बिल मुझ पर हैं। उधार का माल मुझे कहीं भी मिलता है। जहां मेरी उधारी बाकी रह जाती है वहां मैं अपनी गाड़ी ले जाकरखड़ी कर देता हूं। इतना मुझे विद्या के बारे में पागलपन है। इस प्रकार हर किसी को विद्या से प्रेम होना चाहिए। किसी की रांड होती है। वह दूसरे गांव में रहती है। मान लीजिए रात बारह बजे उसे उसकी