354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
याद आती है। फिर वह रात में ही उठ कर चल देता है। न शमशान देखता है न और कुछ। बस निकल पड़ता है। उसके घर पहुंचता है। इतना प्रेम जब पुस्तकों से होगा तभी वह विद्या का सच्चा पुजारी बनेगा। मैं 24 घंटे विद्या की पूजा करता रहता हूं।
मेरी दूसरी प्रेरणा है - स्वाभिमान। मैंने किसी से कोई याचना नहीं की। मेरा लक्ष्य था कि मेरा पेट तो भरना चाहिए और अपने लोगों की सेवा भी करनी होगी। डॉ. परांजपे की विनती से एक महाविद्यालय में इकॉनॉमिक्स का प्रोफेसर बना। तब उन्होंने मुझसे तेरह भाषण देने के लिए कहा। मैंने कहा केवल चार भाषण दूंगा। ठीक लगे तो रखिए या फिर मेरे लिए अपनी राहखुली है। क्योंकि, मुझे अपने लोगों की सेवा करने के लिए समय की जरूरत थी। पोयबावड़ी के नाके कीखोली में मैंने टुकड़ा चावल की रोटी
खाई। लेकिन समाज सेवा को छोड़ कर भारी तनख्वाह की राह पर नहीं गया। राह अपने आप बनती चली गई। लोगों ने थैलियां स्वीकार कर घर बनाए। मेरी जानकारी वाले एक नेता से मैंने सुना है कि 47 हजार के प्रॉमिसरी नोट लिख कर दिए और लोगों ने जब लाख रुपयों की थैली अर्पण की तब वह कर्जा लौटाया। मैं ऐसा नहीं करना चाहता। मैं अपना पेटखुद भर कर जो भी समाज की सेवा करनी थी वह की। में नौकरी करना ही नहीं चाहता था। गवर्नर जनरल कोई भी आए, मेरी उससे दोस्ती हुआ करती थी। लेकिन मैंने किसी से मुझे फलां बनाइए, मुझे फलां जगह दीजिए जैसी कोई याचना नहीं की। हां, औरों के लिए मैंने कुछ अर्जियां दी होंगी। लेकिन अपने लिए चिठ्ठी लिखी हो तो कोई दिखा दे। एक्झीक्यूटिव काउंसिलर होने की मेरी बड़ी तीव्र इच्छा थी। वह पूरी हो गई। अब मुझे ना पेंशन, ना तनख्वाह और ना प्रोविडंट फंड। कुछ भी नहीं। अंग्रेजी राज्य में एक बार काउंसेलरशिप ली। एक बार काँग्रेस के राज में। लेकिन वहां भी काँग्रेस के साथ मेरी नहीं पटी। मैं जज बन सकता था। लेकिन अपने को इस प्रकार फंसा कर करना क्या था? इसलिए, मैं बस यही बताना चाहता हूं कि दीनता नहीं होनी चाहिए। यह मानें कि मैं कुछ हूं। मैं भगवान को भी कमतर आंकता हूं इतना मेरा स्वाभिमान तेजस्वी है। मेरे स्वाभिमान का सामना कौन ईश्वर या देवता है वह भी नहीं कर सकता।
और मेरी तीसरी प्रेरणा है चरित्र। मुझे याद नहीं आता कि कभी मैंने अपनी जिंदगी में किसी के साथ दगाबाजी की हो, किसी को धोखा दिया हो या स्वार्थ के लिए पाप किया हो। इस बारे में मुझे गर्व महसूस होता है। मैं कई बार विलायत गया। लेकिन अब तक मैंने कभी शराब नहीं पी, सिगरेट नहीं पी। मुझे किसी चीज की लत नहीं। किताब और कपड़ा ये दो बातें बहुत प्रिय हैं। चरित्र संवर्धन का गुण मुझमें बड़े पैमाने पर है। यह बताने में मुझे बहुत गर्व महसूस होता है। इस प्रकार मेरे तीन गुरु और तीन प्रेरणा हैं। मैं इन्हीं से बना हूं। इन्हीं की शक्ति से मैं इस पद तक पहुंच सका हूं। मैं केवल कारण हूं। मैं केवल एक पुतला हूं जिनमें इनके कारण जान है। इसीलिए इनका अनुकरण कीजिए। आपने मेरा सम्मान