324 28-10-1954 तीन गुरु और तीन उपास्य आदर्शों की कृपा से मेरा जीवन बना है - मुंबई - Page 374

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किया, वह केवल व्यक्ति के लिए न होकर इन तीन उच्च मानवमूल्य के आदर्श के प्रति कृतार्थता के कारण किया यह कह कर मैं इस राशि को स्वीकार कर रहा हूं।

1919 साल से अर्थात् जब गांधी ने कदम रखा तभी से मैं राजनीति में हूं। इसके बावजूद मेरी कभी उनसे बनी नहीं। कई तरह की कोशिश हमने कीं। महाड का पानी का सत्याग्रह, नासिक का मंदिर प्रवेश का सत्याग्रह कई तरह के सत्याग्रह किए हैं। चवदार तालाब का पानी पीन के या कालाराम मंदिर में जाने से हमें अमरत्व नहीं मिलने वाला। वह हमारे अधिकार की लड़ाई मात्र थी। लेकिन किसी ने सहानुभूति नहीं दिखाई। अखबारों में हमारे व्यंग्यचित्र छपा करते थे। हमारे कार्यक्रमों के लिए संवाददाता नहीं आते थे। मैं बहिष्कृत भारत का संपादक था। 1919 से 1942 तक मैं संपादक रहा। एक बार केसरी में विज्ञापन भेजा। साथ में विज्ञापन की फीस के तौर पर 3 रुपयों का मनीऑर्डर भी भेजा। मनीऑर्डर वापस आ गया। जगह नहीं होने के कारण बताया गया था। टाइम्स ऑफ इंडिया को फोन किया। उन्हें लगा, कहां से ये भिखारी लोग परेशान करने आ गए। उन्होंने जवाब ही नहीं दिया। और अब हमेशा पीछे पड़े रहते हैं, रिपोर्ट दीजिए। ऐसे हालात थे। हमारे आंदोलन ने ऐसे-ऐसे दिन देखे हैं। मैं महार लोगों का असल में बहुत ऋणी हूं। महार लोगों के कारण ही मैं यह सब कर पाया। यह मेरा तीस सालों का अनुभव है। महार युद्धवीर हैं, लड़ सकते हैं, त्याग कर सकते हैं। अन्य कोई भी जाति यह नहीं कर पाएगी। इसलिए, मेरी नजर में उनके मेरे ऊपर बहुत उपकार हैं। मैं यहां जातिवाचक उच्चारण कर रहा हूं इसलिए कोई मुझ पर आरोप कर सकता है। लेकिन मुझे अभिमान है कि मैं इस जाति में पैदा हुआ। इस स्थिति में अस्पृश्य समाज पहुंचा इसका बहुत सारा श्रेय आप पागलों की तरह है। महिलाओं का भी इसमें बहुत बड़ा हिस्सा है। 30 साल पहले महिलाएं बेहद और गलिच्छ तरीके से रहा करती थीं। तब महिलाएं मुझे ‘बामण है’ कहा करती थीं। वे कहतीं ‘हमें बामण नहीं बनना’। आज ऐसे हालात नहीं हैं। लेकिन अभी हम शिखर तक नहीं पहुंचे हैं। मध्य पर पहुंचे हैं। ऊपर चढ़ रहे हैं। पैर कब फिसलेगा कह नहीं सकते। अभी संकट की स्थित बदली नहीं है मैं या वह नेता यह झगड़ा अबखत्म करना होगा। सार्वजनिक कार्य में मदद कीजिए। हजारों संस्थाएं दान-धर्म कर जाति का उद्धार करती हैं। कोकणस्थ ब्राह्मण, देशस्थ ब्राह्मण, प्रभू आदि ब्राह्मणों की संस्थाएं हैं। उन्होंने अपने छात्रों को विलायत भेजा है। बड़े पदों पर बैठाया है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए महीने का एक रुपया अगर देना तय किया तो साल के अंत तक कितना तो काम हो सकता है। मेरे अब ज्यादा से ज्यादा आठ-दस साल ही बचे हैं। बाबासाहेब हैं, इसलिए हमें कुछ नहीं करना कह कर नहीं चलेगा। मैं अब राजनीति से अलग होने वाला हूं। आपकोखुद अपना जीवन उज्जवल बनाना है। त्याग, समर्पण, आदि, बल निःस्वार्थ भाव लगा कर काम कीजिए। मुझे इसी जन्म में आप अपने साथ क्या करते हैं यह देखने दीजिए। मरने के बाद मुझे कैसे पता चलेगा कि आपने अच्छा किया या बुरा किया? मैं आपको सचेत कर यह कह रहा हूं।