325 14-11-1954 राष्ट्र की सैनिकी सुरक्षा के लिए जरूरी है कि हैदराबाद देश की उप-राजधानी बने - हैदराबाद - Page 376

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तैयार नहीं है। हरेक को यही लगता है कि जवाहरलालजी क्या कहेंगे? फलानां क्या कहेंगे? इसी डर ने सबको पछाड़ा हुआ है। यह कैसा प्रजातंत्र है? इसे क्या विवेक कह पाएंगे? आज जिनके हाथ सत्ता है, उन्हें प्रजातंत्र की जानकारी भी नहीं है। उनके मन में जो आता है वही वे करते हैं। उन्हें अगर लगे तभी संयुक्त महाराष्ट्र बनेगा। सभी तरह से मुंबई महाराष्ट्र का ही शहर है। मुंबई पर आज पारसी, गुजराती, मारवाड़ी आदि बाहरी लोगों की पकड़ है, लेकिन यह केवल मुंबई की नहीं देश के सभी बड़े शहरों की बात है। मद्रास, कलकत्ता आदि सभी बड़े शहरों का यही हाल है। मद्रास में आंध्रवासियों के हाथ में 30 प्रतिशत से अधिक व्यापार है। दूसरों की तुलना में आंध्र की जनसंख्या भी अधिक है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद मद्रास भौगोलिक दृषि् से आंध्र से जुड़ा हुआ नहीं है। कोलकाता का उदाहरण भी देखने लायक है। कोलकाता पर बंगाली लोगों के अलावा असामी, उडि़या आदि अन्य प्रांतों के लोगों का ही आर्थिक और व्यावसायिक राज है। बंगाली बाबू वहां केवल क्लर्की और मजदूरी करते हैं। इसके बावजूद कोलकाता बंगाल का ही है। फिर मुंबई महाराष्ट्र की क्यों नहीं? मुंबई महाराष्ट्र की नहीं यह कहना भी अन्याय और अंधेपन का परिचायक है।

मुंबई महाराष्ट्र को मिलेगी, लेकिन अगर उनको कुछ अलग लगा तो वह वैसे ही करेंगे और आपसे कहेंगे, आप होते कौन हैं हमसे पूछने वाले? आपको जो करना है वह कीजिए। उनकी बात सच भी है। क्योंकि उन्हें पता है कि क्लर्कों की यह जात हमारा क्या बिगाड़ लेने वाली है? साथ ही आज का प्रजातंत्र और हर पांच सालों के बाद आने वाले चुनाव उन्हीं के पक्ष में हैं। हमारे प्रजातंत्र में चुनावों के टिकट बिकते हैं। जो ज्यादा पैसा देता है, चालाकियां करता है वह चुनाव जीत लेता है और 5 सालों तक मौज करेगा। जिनके पास भरपूर पैसा नहीं है वे चुपचाप बैठे रहें और जो भी होता है उसे प्रजातंत्र के नाम से आशिर्वाद दें।

राष्ट्र की सुरक्षा और सत्ता में समान हिस्सा हो इस हिसाब से दक्षिण में भारत की सह-राजधानी होना आवश्यक है। मुझे लंबे समय से लगता है कि हैदराबाद, सिकंदराबाद और बोलाराम का सभी हिस्सा केंद्र सरकार अपने कब्जे में ले और यहां देश की सह-प्रति-राजधानी बनाए। दिल्ली में बैठ कर सरकार अगर शासन चलाना चाहती है तब मुझे उसकी सैन्य क्षमता पर हंसी आती है। हमारे राष्ट्र को अगर सैनिकी राष्ट्र बनाना होगा तो दक्षिण भारत में सह-राजधानी होना सुरक्षा के नजरिए से आवश्यक है। आज केंद्र सरकार में उत्तर भारतीयों की संख्या अधिक है। अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की दो प्रांतों के बड़े-बड़े व्यक्तियों के बीच अदला-बदली चलती रहेगी। दक्षिण भारत के सामान्य जन छोटी-मोटी नौकरी के लिए दिल्ली नहीं जा सकते और इसीलिए प्रशासन में उन्हें हिस्सेदारी मिलना संभव नहीं। सभी भारतीय एक हैं यह भले सच हो लेकिन व्यवहार