325 14-11-1954 राष्ट्र की सैनिकी सुरक्षा के लिए जरूरी है कि हैदराबाद देश की उप-राजधानी बने - हैदराबाद - Page 377

358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में यह भावना बेमतलब है। राजनीति में ऐसी उदारता नुकसान ही करती है। भोले-भाले लोगों का इससे नुकसान ही होता है। इसीलिए, हैदराबाद में उप-राजधानी हुई तो दक्षिण भारतीयों को सरकारी कामकाज में हिस्सा मिलेगा। सत्ता में यहां के लोग भी हिस्सा ले पाएंगे। हमारे दिमाग में व्यवहार की ये बातें नहीं आतीं।

अंग्रेजी के ‘लिटरेचर’ शब्द का मराठी अनुवाद - ‘साहित्य’ (‘सामग्री’ के अर्थ में) ग़लत है। साहित्यखाना बनाने का हो सकता है, हजामत का साहित्य हो सकता है। लेकिन अंग्रेजी के लिटरेचर के अर्थ में साहित्य शब्द न्याय नहीं करता। ज्ञानेश्वरी, एकनाथी भागवत, तुकाराम की गाथा आदि हम पड़ते हैं। ज्ञानेश्वर बड़ा विद्वान था। लेकिन मेरी एक आशंका यह है कि ज्ञानेश्वरी में ज्ञानेश्वर ने वेदांत पर भाष्य किया है। ब्रह्म सत्य है और सर्वव्यापी है ऐसा उन्होंने कहा है। यह वही ब्रह्म है जिसे पुराणों ने सृष्टिनिर्माता कहा, जिसने अपनी बेटी सरस्वती के साथ व्याभिचार कर शादी की थी। लेकिन ज्ञानेश्वरी के अंत में उन्होंने चातुर्वर्ण्य का जोरदार समर्थन किया है। ज्ञानेश्वर तथा उसके अन्य भाइयों और बहन को ब्राह्मणों ने जाति से बहिष्कृत किया था। वे फिर से जाति में जाना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने प्रचलित की कल्पनाओं का समर्थन किया। समाज की परम्पराओं के आगे उन्होंने घुटने टेके। ब्रह्म अगर सर्वव्यापी है तो ज्ञानेश्वर कह सकते थे कि अगर आप मुझे बहिष्कृत करते हैं तो मैं महारों की बस्ती में जाकर रहूंगा। उनमें भी ब्रह्म है, लेकिन ऐसा कहने के बजाय उन्होंने भैंसे के मुंह से वेदपाठ करवाया तबसे लेकिन भैंसा बेचारा गूंगा हो गया है।

इंग्लैंड के प्रजातंत्र के पीछे सैंकड़ों सालों की परंपरा है। वहां के आम लोगों की, समाज की सभी अपप्रवृत्तियां नष् होने के बाद उन्हें वयस्क मतदान (Aclult Voting) का अधिकार मिला। हमारे यहां लोगों का अज्ञान ही व्यस्क मतदान का अधिष्ठान बना हुआ है। लोगों के पास और उनके प्रतिनिधियों के पास किसी प्रकार का ज्ञान नहीं हैं। इसलिए इस पोले प्रजातंत्र केखाके का फायदा मौकापरस्त, चालाक और हितैशी लोग फायदा उठाते हैं। उपाधि पाने के लिए मैट्रिक के बाद चार सालों तक पढ़ाई करनी पड़ती है। धीरे-धीरे क्रम से हम उपाधि प्राप्त करते हैं। लेकिन लोकसभा या विधानसभा का सदस्य बनने के लिए या मंत्री बनने के लिए हमारे लोकतंत्र में कोई क्रम नहीं है। कुछ भी कर के कोई भी चुनाव जीत जाते हैं और हजार चक्कर चला कर रातोंरात मंत्री बन जाते हैं। हमारी राजनीति की यही परम्परा है। इस प्रकार चुनाव जीतने वाले के हाथों प्रजातंत्र की परंपरा का निर्माण कैसे होगा? आने वाले 20 सालों तक समाज के शेक्षिक, बौद्धिक और वैचारिक स्तर में सुचारू रूप से बढ़ोतरी करनी होगी। लोगों को समझा कर यकीन दिलाने की पद्धति ( persuasive method ) का हमें अधिक इस्तेमाल करना होगा। हो सकता है, यह तानाशाही जैसा लगे लेकिन यह जरुरी है।