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बौध धर्म दर्शन पर चर्चा में, मैं किसी भी प्रकांड पंडित को परास्त
कर सकता हूँ
आयु. फुंग, वीचार्न ऑफ थाईलैंड की अध्यक्षता में दिनांक 4 दिसंबर, 1954 को रंगून में तीसरे जागतिक बौद्ध धर्म अधिवेशन की शुरुआत हुई। इस अवसर पर अमेरिका, इंग्लैंड, सिलोन, मलाया, जर्मनी, फ्रांस, इंडोनेशिया आदि राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने बौद्ध धर्म और उसकी सीख विषय पर भाषण किए। अध्यक्ष ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की पहचान भारत के प्रतिनिधि, नेता और के सात करोड़ दलितों के नेता के तौर पर कराते हुए उनका सम्मान किया।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने करीब 50 मिनट भाषण किया। पहले उन्होंने इस परिषद् में आमंत्रित करने के लिए आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा,
यहां इकट्ठा हुए बुद्ध के अनुयायी हैं। दुनिया के इतने बड़े राष्ट्रों में बौद्ध धर्म भले ही प्रचलित रहा हो, उसका प्रसार जितनी तेजी से होना चाहिए, उतनी तेजी से हुआ नहीं है यह मुझेखेद के साथ कहना पड़ रहा है। आज यहां जिन राष्ट्रों के प्रतिनिधि उपस्थित हैं उन सभी राष्ट्रों में सिलोन और ब्रह्मदेश ये दो राष्ट्र बौद्ध धर्म मानने वाले राष्ट्रों में आगे हैं ऐसा लगता है। लेकिन मुझे लगता है कि इन दो राष्ट्रों का बौद्ध धर्म के प्रसार का तरीका प्रशंसायोग्य नहीं है।
यहां की अमीर महिलाएंखूब सारा धन दान में देती हैं। धर्म के नाम से इकट्ठा होने वाले हजारों रुपए वे धार्मिक उत्सव के प्रसंगों पर बेकारखर्च करते हैं। घरों में, बाहर, पेड़-पौधों पर बिजली के लट्टू जलाते हैं। इस शृंगार-सजावट में जितना पैसा
खर्च होता है वह सब बौद्ध धर्म के प्रसार के काम परखर्च होना चाहिए यह अपनी राय मैं यहां साफ तौर पर बता देता हूं। ऐश्वर्य और शोभा ये दो बातें भगवान बुद्ध को बिल्कुल पसंद नहीं थीं। जिन देशों में इस धर्म का नाम भी नहीं है वहां धर्म प्रसार की संस्थाएं स्थापित कर उनके जरिए भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षा का बीज बोएं। ये सिलोनी बंधु ऐसा क्यों नहीं करते इस बारे में मुझे बड़ा अचरज लगता है। इसी प्रकार ब्रह्मदेश के लोग भी धार्मिक उत्सवों पर हजारों रुपएखर्च करते हैं। वे रुपए भी अगर
जनताः 18 दिसंबर, 1954