327 4-12-1954 बौद्ध धर्म दर्शन के बारे में मेरे साथ चर्चा करने वाले किसी भी प्रकांड पंडित को मैं हराऊंगा - रंगून - Page 382

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ला दी है। देख कर उन्हें भी बड़ा अचरज लगा।

तीसरी बात यह कि, भारतीय पार्लियामेंट के निशान पर भारत सरकार के प्रतीक के रूप में अशोक चक्र को संविधान में मान्यता दिला दी है। यह सब करते हुए मुझे हिंदू, मुसलमान, ईसाई और पार्लियामेंट के अन्य सदस्यों की ओर से कोई विरोध नहीं हुआ। इतना सुस्पष्ट और हर मुद्दे का विश्लेषण करने वाला मैंने पार्लियामेंट में किया था।

इस तीसरे अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में इकट्ठा आए अठ्ठाईस राष्ट्रों में से क्या किसी एकाध राष्ट्र ने तो ऐसा किया है? इतना करके मैं रुका नहीं, मुंबई शहर में मैंने सिद्धार्थ नाम से एक बड़े कॉलेज की स्थापना की है। इसी प्रकार अजंठा-वेरूल जाते समय रास्ते में पड़ने वाले औरंगाबाद शहर में भी दूसरे कॉलेज की स्थापना की। मुंबई के कॉलेज में 2900 और औरंगाबाद के कॉलेज में 500 छात्र पढ़ रहे हैं।

इन छात्रों से गौतम बुद्ध के जीवन पर एक शोध प्रबंध लिखवा कर सबसे अच्छे शोध प्रबंध को रु. 1000 पुरस्कार स्वरूप देने की मेरी मंशा है। शोध प्रबंध लिखवाने का उद्देश्य यह है कि वे बौद्ध धर्म का गहराई से अध्ययन करें ताकि बौद्ध धर्म का व्यवस्थित प्रसार हो। इस प्रतियोगिता में पारसी, मुसलमान, हिंदू आदि धर्मों के छात्र भी हिस्सा ले सकते हैं।

साथ ही, मेरी इच्छा है कि अगर काफी पैसा इकट्ठा हो जाए तो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, मद्रास इन शहरों में बुद्ध विहार स्थापित कर हर रविवार को लोगों की उपासना के लिए सुविधा मुहैय्या कराई जाए। मेरे द्वारा स्थपित किए गए दोनों कॉलेजों के लिए भारत सरकार से 22 लाख रुपयों का कर्ज मैंने लिया है। मेरी मृत्यु तक मैं यह कर्ज चुका पाऊंगा इस बारे में मुझे थोड़ा शक है। (हंसी)

इस प्रकार इस धर्म को लेकर मेरी कोशिश जारी है। दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जहां बौद्ध धर्म का प्रसार बहुत कम समय में किया जा सकता है। किसान जमीन की पहचान करने के बाद ही उसमें बीज बोता है। उसी प्रकार भारत में बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए कुछ आवश्यक अनुकूल बातें हैं। मेरी आप सभी से विनती है कि उसका हम सभी राष्ट्रों को आर्थिक सहायता का उपयोग करना चाहिए। मैं इस सभागार में वचन देता हूं कि कोई सहायता करे अथवा न करे मैं अपनी राह पर आगे बढ़े बगैर नहीं रहूंगा। (तालियां)

डॉ. बाबासाहेब का भाषण दुनिया के 28 देशों के प्रतिनिधि शांति से और एकाग्रता से सुन रहे थे।