329 25-12-1954 पंढरपूर में बौद्ध धर्म का मंदिर था यह मैं साबित कर सकता हूं - देहू रोड (पुणे) - Page 385

366 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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पंढरपूर में बौद्ध विहार था यह मैं साबित कर सकता हूँ

25 दिसंबर, 1954 के दिन देहू रोड के बुद्ध विहार में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के हाथों भगवान बुद्ध की मूर्ति की विधिविधानपूर्वक स्थापना की गई। मूर्ति की कीमत करीब ढाई हजार रुपए है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरखास कर यह मूर्ति रंगून से ले आए हैं। इस समारोह में 40 हजार से अधिक लोग उपस्थित थे।

एडवोकेट शंकररावखरात, ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी, महाराष्ट्र प्रदेश शे. का. फे. के हाथों ध्वज फहराया गया।

उपस्थित जनसमुदाय का मार्गदर्शन करते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-

आज इस जगह, छोटे से विहार में भगवान बुद्ध की मूर्ति की स्थापना की गई है। हमेशा की तरह जब कोई मंदिर का निर्माण होता है तब उसमें भैरोबा,खंडोबा, मरीआई आदि कई तरह के भगवानों की मूर्तियां रखी जाती हैं। हमारे लोगों के मन भक्तिभाव से परिपूर्ण होने के कारण वे विष्णू, शिव जैसे भगवान की मूर्तियों की स्थापना करते हैं। यहां का प्रसंग थोड़ा अलग और नया है। इस मंदिर में मरीआई,खंडोबा, महादेव नहीं लाए गए हैं, यहां आज नए देवता को लाकर उनकी स्थापना की गई है। सभी के लिए यह प्रसंग नया है। हम में से कुछ लोगों ने भगवान बुद्ध का नाम भी नहीं सुना होगा।

कुछ लोग कहते हैं कि यह नए भगवान कहां से लाए हैं? ये भगवान कहां से लाए हैं, उसकी उत्पत्ति कैसे हुई? यह जानना अत्यंत आवश्यक है। बुद्ध भगवान का यह धर्म इस देश में बहुत ही प्राचीन समय से चला आ रहा है। प्राचीन समय में यह धर्म इसी देश में निर्माण हुआ। चीन, जापान, सयाम, इंग्लैंड आदि बाहरी किसी देश से यह धम्म नहीं लाया गया है। यह यहीं का वृक्ष है। इस भगवान को कौन यहां लेकर आया इस बारे में कई सवाल पूछे जाते हैं । इस बारे में पहलाखुलासा इस प्रकार किया जा सकता है कि इस देश के पुरातन देवता हमें जगह-जगह मिलते हैं, उन्हीं में से यह भी एक हैं। यह भगवान यहीं के हैं।

कई ऐतिहासिक कारणों से इस धर्म का यहां लोप हुआ होगा। इस धर्म के शत्रु इस देश में रह ही नहीं पाते। मराठी में शत्रु को बोलते हुए कहते हैं - ‘मेरे भगवान जलती ज्योति हैं। मेरे भगवान कोई कच्चे नहीं हैं। तुम पर छोड़ूंगा तो वह तुम्हारा सत्यानाश करेंगे।’ मैं आज आपको बतात हूं कि यह धर्म भी वैसा ही है। यह देखने के लिए मैं

जनता, 1 जनवरी, 1955