368 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उनकी पनाहगाहें थीं। महाराष्ट्र में जो भी पुरातनकालीन मूर्तियां हैं वे सब की होने की बात बताई जाती है। लेकिन कहां विराट नगरी और कहां पांडवों की राजधानी!
इन विहारों में 25 भिक्षु होते हैं। पंद्रह हजार विहारों में करीब 35 हजार भिक्षु रहा करते थे। लोगों से भिक्षा मांग कर अपना गुजारा करते थे। वे एक हजार दो सौ पचास सालों तक इस प्रांत में थे। हम टूटा घर फिर से बनाते हैं। उस पर टीन लगाते हैं, नई छत डालते हैं, यानी उस घर का जीर्णोद्धार करते हैं। बाप-दादाओं के समय से हम भगवान की पूजा करते आए हैं। उसी भगवान को हमें फिर से पूजना है। मेरी साफ राय है कि इस देश में धर्म अब बचा नहीं है। हिंदू लोगों की धर्म की व्याख्या बहुत अलग है। मंदिरों में जाना, घंटा बजाना, पूजा करना और पुजारी को दो पैसे का दान देना इतना ही धर्म रह गया है। मानो ब्राह्मण के बाप से लिया गया ऋण चुकाना। हमसे यह हो नहीं पाया। विष्णू की पूजा करने से विष्णू प्रसन्न नहीं हुआ। भगवान शिव के मंदिर जाने के बाद भी वह प्रसन्न नहीं हुआ। मरीआई, म्हसोबा,खंडोबा भी प्रसन्न नहीं हुए। व्यक्ति के और समाज के जीवन के लिए आवश्यक होने के कारण धर्म की जरूरत तो है ही। धर्म को नीति का बंधन चाहिए। कुछ लोग मुझसे पूछते हैं कि धर्म से क्या लेना-देना है? लेकिन मेरा उनसे यही सवाल है कि हमने अगर डल्लीखाना छोड़ दिया है। अगर पेट ही भरना है तो आप भी डल्ली, सागोती क्यों नहींखाते? धर्म दुराचार पर नियंत्रण रखता है। आपको बताने लायक बहुत कुछ है। लेकिन आप लोगों की भाषा में मैं क्या बता पाऊंगा? यहां उदाहरण के तौर पर मैं एक ही बात बताता हूं। बैलगाड़ी में दो पैर, दो बैल, गाड़ी, और चलाने वाला आदमी आदि बातें होती हैं। मैंने बचपन में बैलों को हांकने का काम किया है। गाड़ी में तेल डाला जाता है। पहिए में कील होगी तो बैल गाड़ीखींचेगा। इसी प्रकार इंसान के पापी, दुराचारी बर्ताव पर कसी हुई लगाम है धर्म। धर्म के बंधन के बगैर कार्य टिका नहीं रह सकता।
किसी भी धर्म को अपनाते समय उसे अच्छी तरह से जांच-परख कर ही लेना चाहिए। हम बाजार में जाते हैं। सोनाखरा है अथवा नहीं इसकी परख कर लेते हैं। उसी प्रकार धर्म एक बाजार है। यह विष्णू की, राम की, शिव की दूकान है। यहां पुजारी धूप-कपूर जलाते हुए बैठे हैं। कृष्ण, राम, विष्णू शिव का धर्म इसी प्रकार का धर्म है। धर्म इंसान का उद्धार करता है। धर्म किसी को धोखा देने के लिए नहीं होता। हमारी अवनति जातिभेदों के कारण हुई है। जो धर्म जातिभेदों से भरा है जिस धर्म में असमानता है वह धर्म हम कैसे अपनाएं? जिस धर्म में समानता का अधिष्ठान है वह धर्म हमें चाहिए। बौद्ध धर्म में सभी को समान अवसर, सभी को समान अधिकार दिए गए हैं। उसमें एकता है, भेदभाव नहीं।
यहां आपको एक सूक्त याद दिलाना चाहता हूं। ब्राह्मणों के बच्चे थे, उनमें दर्शन को