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लेकर कोई विवाद था- ‘ब्रह्म घर है और आत्मा ब्रह्म की छाया है। सूरज और सूरज का प्रतिबिंब, घर और घर की छाया, इसी प्रकार ब्रह्म और आत्मा की बात है।’ असल में ये सब पुराणों की बातें हैं। ब्रह्म की छाया ही अगर आत्मा है तो अस्पृश्यों को शनिवार वाड़े के हौज से पानी भरने क्यों नहीं दिया जाता? विवाद का कोई अंत नहीं हो रहा यह देख कर बच्चे बुद्ध के पास गए। उन्हें ब्राह्मणों का दर्शन रास नहीं आया था। भगवान बुद्ध ने उनसे पूछा- क्या यह ब्रह्म सत्य है? क्या आपने ब्रह्म को देखा है? ब्रह्म कुछ समय के लिए है या फिर हमेशा के लिए? उसका रंगरूप कैसा है? वह कुछ बोलता है क्या? उसमें रस है या सुगंध? वह गुलाब के फूलों सा है या कि चंपा के फूलों-सा? वह मीठा है,खट्टा है या तीखा है?
मनुष्यमात्र के पास सत्य का पता करने के लिए पांच इंद्रीयां हैं। आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा। आंखों से देखा जा सकता है। कान से सुना जा सकता है। नाक से गंध का पता चलता है। जीभ से स्वाद का पता चलता है। पांचों इंद्रियों का साक्ष्य जिसे प्राप्त है वह है सत्य। ब्रह्म को सत्य मानना यानी बिना देखे किसी लड़की से प्रेम करने जैसा है। भगवान बुद्ध का धर्म समानता का धर्म है। हाल ही में लक्ष्मण शास्त्री जोशी द्वारा मेरे बारे में लिखे गए लेख के बारे में मुझे पता चला है। मेरे बारे में वैसे कोई लिखता नहीं है और अगर किसी ने लिखा तो वह अच्छा ही होगा यह कहा नहीं जा सकता। जोशी ने अपने लेख के अंत में लिखा है कि डॉ. अम्बेडकर का अवतार कार्य अबखत्म हो चुका है। लेकिन असल में मेरा अवतार कार्य अभीखत्म नहीं हुआ है, वरन् अभी उसकी शुरुआत हो रही है। लक्ष्मण शास्त्री जैसा विद्वान आदमी अगर इस प्रकार लिखने लगे तो क्या कहा जा सकता है? हमने महाड में सत्याग्रह आंदोलन किया। आप हिंदू लोग हमें हिंदू कहते हो ना! इसलिए आप लोग हमें पानी पीने देते हो या नहीं यही देखने के लिए हमने सत्याग्रह किया था। हमें मंदिर में प्रवेश दिया जाता है कि नहीं यह देखने के लिए मंदिर-प्रवेश आंदोलन किया। इतने दिनों से हमने इस प्रकार जमीन की निराई-गुडाई कर उसे फसल बोने लायक बनाया है। अब मेरी उम्र बहुत कम ही बची है। दुर्भाग्य से सामाजिक कार्य मुझसे पूरे नहीं हो पाए हैं। अन्य सभी कामों से अब मैं अवकाश प्राप्त करने जा रहा हूं। मुझे बौद्ध धर्म के प्रसार का काम करना है। आज का प्रसंग देख कर कुछ लोग हमारा मजाक भी उड़ाएंगे। लेकिन अच्छा काम हमेशा कठिन होता है। महार जाति धैर्यवान है। उसके सिर पर अन्य जातियां हैं। लंगोट, कमर और लाठी यही उसकी पोषाक है। जैन साधु नग्न घूमते हैं। उनके ही जैसे हम भी नंगे घूमेंगे।
मैं आपसे दो बातें कहना चाहता हूं। इस धर्म को स्वीकार करेंगे उसी दिन आपको कई काम छोड़ने पड़ेंगे। एकादशी को पंढरपूर जाना, द्वादशी को अन्य क्षेत्र में जाना बंद करना होगा। मुझे अच्छी तरह से याद है। नासिक जिले में त्र्यंबक में कुंड था। इस कुंड