329 25-12-1954 पंढरपूर में बौद्ध धर्म का मंदिर था यह मैं साबित कर सकता हूं - देहू रोड (पुणे) - Page 389

370 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में केवल अंजुली भर जल था। यात्री उसमें कपड़ा भिगो कर उसी से बदन पोंछ लेते थे। इस प्रकार की खिचड़ी बौद्ध धर्म में मैं होने नहीं दूंगा। साफ पानी में गंदा पानी उढेलना नहीं चाहिए। भगवान बुद्ध का जो धर्म वही हमारा धर्म है यह अब हमने तय किया है। आप पंढरपूर जाते हैं, पांडुरंग के अभंग गाते हैं। पुणे के इतिहास अनुसंधान मंडल के लोगों में पंढरपुर का विट्ठल कौन था इस विषय पर हुज्जत चल रही है। मैं उनसे एक सवाल पूछना चाहता हूं कि विट्ठल का घपला छोड़ कर पहले इस सवाल का जवाब दीजिए कि पंढरपूर का पांडुरंग कौन है? इसका जवाब पहले दीजिए। वह कहां का है? उसे कौन भगा कर ले गया? किसने उसे डुबोया? पांडुरंग यानी पंढरपुर में बौद्ध धर्म का विहार था यह मैं उन्हें साबित करके बताऊंगा। (तालियों की गड़गड़ाहट) पुंडलिक शब्द से पांडुरंग शब्द बना। पुंडलिक का अर्थ है कमल। बौद्ध धर्म में मूर्तिपूजा नहीं थी। अज्ञानी लोग दर्शन क्या जाने। कमल को पाली भाषा में पांडुरंग कहते हैं। आपको धोखा देने के लिए ब्राह्मणों ने बुद्ध के नाम का लोप कर दिया। ये मतलबी लोग महाराष्ट्र के उत्कीर्ण कला के नमूने पांडवों के होने की बात बताते हैं। श्पांडवश् यहां क्यों आए थे? पांडव दिल्ली से बाहर 80 मील से परे कहीं नहीं गए। अलवर स्टेट में उन्होंने 1500 शिल्पकला के नमूने छोड़े कैसे? उनके पास न तो छैनी थी न फावड़ा। भगवान बुद्ध ने कहा कि ‘यहां आओ और देखो’! केवल मैं कहता हूं इसलिए आप धर्म अपना लो ऐसा नहीं है। तुम्हारी अविद्या अगर नष्ट हुई तो ही तुम इस धर्म का स्वीकार करो। आपको एक बात बताना बाकी रह गया है। यह विहार जो बनाया गया है वह बेहद छोटा है। उसे अगर जिस हाल में वह है उसी हाल में आप रखेंगे तो आपको कलंक लगेगा। इस विहार के लिए एक हॉल की जरूरत है। प्रदक्षिणा करने के लिए जगह की जरूरत है। आप सब लोग चंदा कर इस विहार को भव्य रूप देने की कोशिश कीजिए। लेकिन, भगवान के नाम पर इकठ्ठा किया जाने वाला पैसाखाइए मत। उस विहार में रोजाना बुद्धि का दिया गया मानव मूल्यों का उचित संदेश देने वाली बुद्धिवंदना, भिक्षरण, पंचशील, आर्य अष्टांगिक मार्ग तथा उनके संदेशों का वाचन होगा, छात्रों को पढ़ाई करने के लिए भी यह बुद्ध विहार खोला जाएगा।

आज के प्रसंग के अनुकूल जो भी कुछ कहना था वह मैंने कह दिया है। आज का यह प्रसंग इतिहास में दर्ज होने वाला है। बारह सौ सालों के बाद बुद्ध की प्रतिमा की स्थापना करने का पहला सम्मान हमें मिला है। इसका सारा श्रेय हमें ही है। इसीलिए हमें धन्यता महसूस करनी चाहिए।