237 17-2-1946 सिर पर कफन बांध कर हम युद्धभूमि में उतरे हैं - रमाबाई अम्बेडकर नगर (मुंबई) - Page 39

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं काँग्रेस वालों से कहना चाहता हूं कि उनकी इस प्रकार की धमकियों से, अत्याचारी हमलों से या उनके कृत्य से हम डरने वाले नहीं हैं। सिर पर कफन बांध कर ही हम लड़ाई के मैदान में उतरे हैं। सामना करने की हमारी पूरी तैयारी है। जो होना होगा वह देखा जाएगा। अपने समाज की आजादी के लिए सभी स्वार्थ त्यागने की तैयारी हम कर चुके हैं। अपमानजनक ढंग से हम किसी की शरण में नहीं जाएंगे। अपने सामर्थ्य पर हमें पूरा भरोसा है। हम दुश्मन की नाक में दम करके छोड़ेंगे। (तालियों की गड़गड़ाहट)। जीत आखिर हमारी ही होगी।

द्रोण मुनि जाति से ब्राह्मण था। वह अमीरों की बस्ती में रहता था। उसके बेटे का नाम था अश्वत्थामा। अमीरों के बच्चे चांदी के बर्तनों में दूध पिया करते थे। देख कर अश्वत्थामा भी अपनी मां से दूध मांगता। गरीब होने के कारण द्रोण के घर में चांदी का बर्तन तो था ही नहीं, गाय भी नहीं थी। बच्चे को बहलाने के लिए मां पानी में आटा मिला कर मिट्टी के बर्तन में भर कर अश्वत्थामा को देती और बाकी बच्चों के साथ वही दूध पीकर अश्वत्थामा संतोष कर लेता। एक दिन द्रोण ने यह देखा। अपना बेटा मिट्टी के बर्तन में आटा-पानी मिला कर बनाया दूध बाकी बच्चों के साथ बैठ कर पीता है यह देख कर द्रोण को बहुत दुख हुआ। उसके मन में आया, मेरे जिंदा रहने का मतलब ही क्या हुआ? कहीं से मुझे एक गाय हासिल करनी होगी। उसे लगा द्रुपद राजा अपना गुरुबंधु है। उसके पास जाकर उसे अपने गुरुबंधु होने की याद दिलाने से गाय मिल सकती है। इसी आशा से वह द्रुपद राजा की नगरी पहुंचा। राजमहल के द्वार के पास जाते ही द्वारपाल ने उससे पूछा कि, तू कौन? द्रोण ने कहा कि, वह राजा का गुरुबंधू है। चीथड़े पहना हुआ आदमी राजा का गुरुबंधू कैसे हो सकता है यह सोच कर द्वारपाल जोर-जोर से हंसने लगे, द्रोण का मषाक उड़ाने लगे। आखिर किसी सयाने आदमी ने दरबार में राजा को वबर भेजी कि आपका कोई गुरुबंधू द्वार पर खड़ा है और आपसे मिलना चाहता है। गुरुबंधू होने की याद दिलाने के लिए द्रोण ने राजा को कुछ बातें बताईं और गाय देने की गुजारिश की। यह दरिद्र व्यक्ति भरे दरबार में अपने से रिश्ता बता कर अपनी श्रेष्ठता में कलंक लगा रहा है सोच कर द्रुपद को बड़ा गुस्सा आया और उसने अपने सेवकों से धक्के मार कर द्रोण को दरबार से निकाल दिया। बाहर निकलते हुए द्रोण ने पीछे मुड़ कर राजा से कहा, राजा, अगर तू गाय देना नहीं चाहता था तो मुझे बता देता, लेकिन मुझे वैसा बताने के बजाय भरे दरबार में तूने मेरा अपमान किया। प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं इस अपमान का बदला लूंगा। अपने शिष्यों के जरिए तुम्हारे हाथ-पैर बंधवा कर अपने पैरों पर लोट लगवाऊंगा, तभी अपना नाम द्रोणाचार्य बताऊंगा। इतना कह कर द्रोण वहां से निकल गया।

आगे द्रोण ने कौरव-पांडवों को धनुर्विद्या सिवाई। विद्या संपादन करने के बाद अन्य शिष्यों की तरह ही अर्जुन ने जब द्रोण से पूछा, ‘मैं आपको क्या गुरुदक्षिणा दूं?’ तब