372 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आज की शुरुआत मैं धर्मोपदेश के साथ करने वाला हूं। बौद्ध धर्म के बारे में मैं बताना चाहता हूं। बौद्ध धर्म की मेरी घोषणा आज की नहीं, मैं 14 वर्षों का छात्र था तभी से है। चौदह साल की उम्र में ही बौद्ध धर्म से मेरा परिचय हुआ । चौदह साल का था तभी से रामायण, महाभारत कृष्णलीलामृत, शिवलीलामृत, श्रीधराख्यान आदि सभी मराठी ग्रंथ मेरे पिताजी ने मुझसे दस-दस बार पढ़वा लिए थे। उस वक्त पिताजी के बर्ताव से मैं ऊब गया था।
एलफिन्स्टन हाइस्कूल में था तब मैंने कोई परीक्षा उत्तीर्ण की थी। तब मैं जिस ‘बटाटायाची चॉल’ में रहता था वहां के लोगों ने मेरे पास होने के उपलक्ष्य में अभिनंदन करने के लिए एक सभा आयोजन करने की सोची। दादा केलुस्कर की मध्यस्थता से वहां के लोगों ने बहुत कोशिशें कर मेरे पिताजी को इसके लिए मनाया। एक टेबल और कुर्सी के साथ सभा की शुरुआत हुई लेकिन सभा में केवल गिने-चुने लोग ही उपस्थित थे। बाकी लोग लंगोटी पहन कर अपने अपने घरों की दहलीज पर पान चबाते हुए बैठे थे। सभा का महत्व किसी को नहीं था।
लेकिन आज के हालात अलग हैं। आज अस्पृश्य समाज में काफी जागृति हुई है। बचपन में मेरे अभिनंदन के लिए जिस सभा का आयोजन किया गया था उसके अध्यक्ष दादा केलुस्कर थे। उस वक्त मैं अपनी अल्पमति से सभा में जो भी बोला था मुझे कुछ याद नहीं है। भाषण के बाद आयु. केलुस्कर ने मुझे गौतम बुद्ध का चरित्र उपहारस्वरूप दिया था। मैंने उससे पहले रामायण-महाभारत जैसे कई ग्रंथ पढ़े थे। उसी प्रकार यह किताब भी मैंने पढ़ी। लेकिन मेरे ध्यान में आया कि इस किताब से मिली सीख अन्य किताबों से मिली सीख में बहुत अधिक अंतर है। आगे चल कर इस किताब की ही तरह मैं अन्य किताबें पढ़ता रहा और धीरे-धीरे मेरे दिमाग में बातें साफ होती गईं। बौद्ध धर्म कैसा है, हिंदू धर्म कैसा है, दोनों धर्मों में कितना और कैसा फर्क है। दोनों का दृष्टिकोण कितना अलग है इसका मुझे पता चलने लगा।
मेरे पिताजी कहते कि हम गरीब हैं, लेकिन हमारी महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी होनी चाहिए। महाभारत के द्रोणाच्रार्य गरीब थे। द्रोण के बच्चों को उनकी माता बाजरे का आटा पानी में मिला कर उसे ही दूध के नाम पर पिलाती थीं। कर्ण भी गरीबी से ही ऊपर उठा। बड़े पुरुष हमेशा गरीबी से ही ऊपर उठते हैं। मिली हुई गौतम बुद्ध के चरित्र की किताब मैंने पढ़ी तो मेरा मन डांवाडोल होने लगा। अन्य धर्मग्रंथों का पठन मुझे गलत लगने लगा। पिताजी की मृत्यु के बाद ऐसे धर्मग्रंथों के पठन का संकट मेरे ऊपर से टल गया।
उच्च शिक्षा पाने के लिए मैं अमेरिका गया। वहां भी बौद्ध धर्म का मैंने काफी अध्ययन किया। बौद्ध धर्म समझने के लिए और बुद्ध धर्म-चरित्र के कारण मेरे मन में उठे बवंडर को शांत करने के लिए मैंने वहांखूब किताबें पढ़ीं। बहुत चिंतन किया। तभी