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मुझे हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का अंतर पता चला। बौद्ध धर्म के बारे में मेरा पागलपन काफी पुराना है।
लोग कहते हैं कि राजनीति में मेरा नुकसान हुआ है। अब बौद्ध धर्म के कारण भी मेरा नुकसान होना है। मैं उस नुकसान को भुगतने के लिए तैयार हूं। धर्म मेरा निजी मामला है। बौद्ध धर्म मुझे समझ आया, ठीक लगा। मैंने उसे लिया। राजनीति के झूठे चुनाव मुझे नहीं चाहिएं। झूठे चुनावों के कारण मैं महामंत्री भी बन सकता हूं। लेकिन मैं यह नहीं चाहता। राजनीति यानी क्रिकेट काखेल नहीं है। वह एक संप्रदाय है। रामानंदी, कबीरपंथी इंसान को अगर कहा जाए कि तू अपना पंथ छोड़ तो वह अपना पंथ नहीं छोड़ता। उसी प्रकार मेरा धर्म अटल था। मैंने एक बार स्वीकारा तो फिर मुझे उसी मार्ग से आगे बढ़ना होगा।
मैंने बौद्ध धर्म स्वीकारा है। आप भी स्वीकारें। केवल अस्पृश्य समाज द्वारा ही इस धर्म के स्वीकार से काम नहीं चलेगा। मेरी इच्छा है कि पूरे भारत द्वारा और समूची दुनिया के द्वारा इस धर्म को स्वीकार किया जाना चाहिए। (तालियां)
मैंने बौद्ध धर्म क्यों स्वीकारा इसके कारण मैं आपको बताता हूं। इसके कारणों की मीमांसा करना सही रहेगा। गौतम बुद्ध को पहले पांच शिष्य मिले। उन्हें पंचवर्गीय भिक्षु कहते हैं। कुल 40 शिष्य बनने के बाद बुद्ध को लगा अब शिष्यों को सम्मति देनी चाहिए। धर्मप्रचार के लिए दूर-दूर तक भेजा जाए। उस वक्त बौद्ध धर्म की व्याख्या गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को इस प्रकार बताई। ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, लोकानुकंपाय, हिताय, सुखाय, देव मनुस्सानं, धम्म आदी कल्याणं, अंति कल्याणं।’
बौद्ध धर्म बहुजनों के हित के लिए, सुख के लिए, उनसे प्रेम करने के लिए है। इस धर्म का स्वीकार केवल इंसानों द्वारा करके ही काम नहीं चलेगा। देवताओं के द्वारा भी इसका स्वीकार किया जाना चाहिए। (तालियां) जिस प्रकार गन्ना जड़ में, बीच में और ऊपरी सिरे पर भी मीठा होता है उसी प्रकार बौद्ध धर्म शुरू में कल्याणकारी है, मध्य में कल्याणकारी है और अंत में भी कल्याणकारी है। इस धर्म के आदि, मध्य और अंत सभी हितकारी और कल्याणकारी हैं।
लेकिन कोई मुझे बताए कि हिंदू धर्म - जिसे मैं ब्राह्मण धर्म मानता हूं - क्या बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय है ब्राह्मण और अन्य विद्वान लोग बताते हैं कि ब्राह्मण धर्म की संस्कृति 10 हजार साल पुरानी है। पुरानी संस्कृति है, लेकिन आज भी हिंदू धर्म में 7 करोड़ से अधिक अस्पृश्य लोग हैं। समाज से बहिष्कृत किए जाने के कारण जंगल में रहने वाले और चोरियां करके अपनी उपजीविका कमाने वाले कई लोग भी इस धर्म में हैं। बताइए, क्या ऐसे हिंदू धर्म को ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ धर्म कहा जा सकता है?