374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दुनिया के कुछ कम्युनिस्टों को छोड़ दिया जाए जो धर्म जिसे नहीं चाहिए ऐसा एक भी व्यक्ति इस दुनिया में दिखाई नहीं देता। हमें भी धर्म चाहिए। लेकिन वह सत्धर्म होना चाहिए, जिसमें सभी लोग समान होने चाहिएं। सबको समान मौके मिलें। यही सच्चा धर्म है। बाकी सभी अधर्म ही कहलाएंगे।
हिंदू धर्म की शिक्षा के अनुसार अगर दुनिया में सर्वत्र ब्रह्म ही है तो फिर महारों, मांगों में, चमारों में भी उसे होना चाहिए। तो फिर हिंदू धर्म में ऐसी असमानता क्यों?
1910 में जब हिंदू-मुसलमानों में जातीयता को लेकर बखेड़ा शुरू हुआ तब हिंदू किसे कहा जाए? हिंदुओं की परिभाषा क्या है? जैसे मुश्किल सवाल उपस्थित हुए। तब देश के 11 विद्वानों ने 11 अलग-अलग परिभाषाएं दीं। और तब हिंदू शब्द में समाहित मनमुटाव और अराजकता सामने आई और पता चला कि वह कितना हास्यास्पद है। किसी की बात दूसरे की बात से नहीं मिल रही थी। सावरकर की हिंदू शब्द की व्याख्या देखिए -
‘आसिंधुः सिंधु पर्यंता यस्य भारत भूमिका।
पितष्भुभुः पुण्यभुश्चैव सवै हिंदुः इति उच्च्यते’
राधाकृष्णन कुछ और ही कहते हैं -
‘प्रामाण्यं बुद्धिर्वेदषु साधनानाम् अनेकता उपास्या नाम नियमः’
तिलक की नजर में वेदों को प्रमाण मानने वाला हिंदू है। फिर धर्माचरण में उसकी साधना भले कुछ भी हो। किसी हिंदू व्यक्ति द्वारा वेदों को प्रधानता देकर पीर की भी पूजा की जाए तब भी कोई हर्ज नहीं, वह हिंदू ही है। क्या कहें तिलक की इस परिभाषा को? फिर बताइए, ऐसा धर्म क्या ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ हो सकता है? (तालियां)
बौद्ध धर्म की स्थापना होती देख कर कई लोगों ने आवाजें उठानी शुरू की है। अखबारों में टीका-टिप्पणी की जा रही है। लेकिन उनकी तरफ ध्यान देने के लिए फिलहाल मेरे पास समय नहीं है।
एक बार सबका लिखना हो जाने दीजिए। देखते हैं मेरे खिलाफ कौन-कौन और क्या-क्या लिखते हैं। उनका लिखना बंद हो जाए तो फिर मैं अपनी लेखनी (कलम) उठाऊंगा।
धर्म हर मनुष्यमात्र के जीवन के लिए आवश्यक है और पोषक है। अन्य धर्मों की तरह क्या आत्मा है? वह कहां है? यह मैं नहीं जानता। अंगूठे जितना है या कलेजे के पास बैठा है पता नहीं। मैंने अभी तक भगवान को देखा नहीं है। हिंदू धर्म भगवान, आत्मा को मानता है। लेकिन उसमें इंसान के लिए जगह कहाँ है?