376 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आर्थिक मुद्दों को नजरंदाज करना होगा ऐसा अगर किसी ‘आदमी’ का कहना हो तो वह मुझे अपनी आर्थिक योजनाएं बताए। मुझे अगर वह योजना ठीक लगी तो मैं अपनी सारी ताकत उस पर काम में लगा दूंगा।
ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म में फर्क है। ईसाई धर्म में ईसा ने बताया है कि गरीबों, आप दरिद्रता से ना डरें। मरने के बाद सारी दुनिया आपकी ही है। (हंसी) बौद्ध धर्म में आर्थिक मसले को इस प्रकार टाला नहीं गया है।
एक बार अनाथपिंडिक ने भगवान बुद्ध से आर्थिक मसलों के बारे में सवाल पूछा था। तब भगवान ने जवाब दिया था, ‘‘संपत्ति मानवी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। संपत्ति इकठ्ठा करें लेकिन उसका इस्तेमाल दूसरों को परेशान करने के लिए, दूसरों को गुलामी में जकड़ने के लिए कभी ना करें। संपत्ति शुद्ध साधनों से कमाई जाए और उसका अच्छा उपयोग हो।’’ धर्म और अर्थ यह दोनों बातें इंसान के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। जीवनोपयोगी वस्तुओं के लिए धर्म और अर्थ दोनों की जरूरत है।
शाक्य लोगों में रूढि़ थी कि साल में कम से कम एक बार तो मालिक कोखेती करनी चाहिए। उसके अनुसार भगवान ने पिता से सवाल पूछा, ‘‘दूसरों की मेहनत का फल हमखाएं तो क्या यह सही है?’’ हमें अपना अनाजखुद कमा करखाना चाहिए। धर्म और अर्थ ये दोनों बातें साथ साथ करनी होंगी। इसलिए अपनी योजना से आर्थिक हानि होगी यह वे मुझे साबित करके बताएं। केवल अर्थ के बारे में सोचने से भी हानि होगी अर्थ के साथ धर्म भी होना चाहिए।
कम्युनिजम कैसे जिंदा रहा? वह कैसे टिका रहा? यह शक्ति की बात है। शक्ति और जबरदस्ती के कारण वह टिका हुआ है। उन्हें प्रॉपर्टी, मालमत्ता चाहिए। रूस में प्रॉपर्टी के लिए गृहकलह मचा हुआ है। रूस के कड़े अनुशासन का पालन करने वाले जमींदारों के लुप्त होते ही लोग उछल करखड़े हो जाएंगे।
अराजकता मचेगी और फिर सामाजिक व्यवहारों में अराजक मचेगा। बुद्ध का धर्म कम्युनिज्म में है। बौद्ध धर्म के भिक्षुओं की तरह कम्युनिस्टों को तय जीवनोपयोगी चीजें रखने का अधिकार है। वे वस्तुएं हैं - लोटा, पानी छानने के लिए कपड़ा और उस्तरा।
भगवान बुद्ध के निर्वाण को अब 2 हजार साल बीते हैं। लेकिन आज भी यह धर्म जोरदार ढंग से फैल रहा है। इसका कोई शासक नहीं और सर्वाधिकारी नहीं। अंतकाल में उनके शिष्य ने भगवान से पूछा, ‘‘भगवंत, आपके चले जाने के बाद इस धर्म का क्या होगा? इसके लिए कोई शासक, कोई हाकिम रखिए।’’ तब भगवान ने जवाब दिया कि, मेरी गैरहाजिरी में धर्म ही आपका शासक होगा। उसका अगर आप पालन नहीं करेंगे तो क्या फायदा? विशुद्ध मन से अपनाया गया धर्म ही आपका शासक होगा।’’