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प्रजातंत्र के दो दुश्मन हैं - तानाशाही और आदमी-आदमी में भेद
करने वाली संस्कृति
यह सभा ब्रह्मदेश के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यू चॅन ट्यून ( Hon'ble Justice U Chan Htoon, Judge of the Supreme Court of the Union of Burma) के सम्मान में दिनांक 3 अप्रैल, 1955 को मुंबई के बुद्ध भवन, सिद्धार्थ कॉलेज में आयोजित की गई थी। इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-
बहनों और भाइयों, जनतंत्र के दो प्रमुख शत्रु हैं - एक है तानाशाही और दूसरी है इंसानों के बीच भेद करने वाली संस्कृति। अमेरिकी स्वतंत्रता के बारे में बकल ने कहा है कि तानाशाही के कारण निर्माण हुई शक्ति या सामाजिक संगठन स्थायी नहीं हो सकता। क्योंकि, तानाशाही का स्वरूप ही मूलतः अबाधित नहीं होता। उस प्रेरणा को हटा लिया जाए तो वह संगठन डिग जाता है। इसीलिए कम्युनिज्म की सत्ता अबाधित नहीं है। इसी प्रकार, इंसानों में भेद करने वाली नीति, हेतुतः सामाजिक, आर्थिक भेद करने वाली संस्कृति दोनों से जनतंत्र के स्वरूप कोखतरा है।
हिंदु धर्म के बारे में बोलना हो तो उसे मोटे तौर पर मुख्यतया तीन प्रमुख हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला होगा पद-दलित निम्नवर्ग- धर्म ने इस वर्ग की सामाजिक और आर्थिक घुटन की व्यवस्था की है, दूसरा वर्ग ब्राह्मणेतरों और अन्य पिछड़ों का वर्ग है- यह वर्ग तुलनात्मकता से स्थितिप्रज्ञ वर्ग है। इस वर्ग में बदलाव लाने की राह का प्रमुख रोडा है इसकी अशिक्षा। शिक्षा के अभाव के कारण इस वर्ग में नए अहसास जगाने में अधिक देर लगेगी। तीसरा और आखिरी वर्ग है ब्राह्मण और तत्सम जातियों का। इस वर्ग के लिए इस धर्म में विशेष हक और अधिकारों की योजना है। यह वर्ग अपने अधिकारों पर तथा उपभोगों पर अतिक्रमण के बाद कालानुरूप बदलाव तो दूर की बात है, प्रतिकार किए बगैर नहीं रह सकता। क्योंकि, धर्म ने उन्हें जो उच्च स्थान दिया है उसे वे कायम रखना चाहते हैं। इसीलिए वे इस प्रकार का धर्म कायम रखना चाहते हैं। उनकी नजर होने वाले बदलावों की ओर स्थिर नजरिए से देखती है और वेदों से परे देखते हुए उनका बौद्धिक प्रतिपादन - उनके विचार अकलुषित नहीं रह सकते। लेकिन मैं बहुजन समाज की उपेक्षा नहीं कर सकता। इसीलिए अपनी सारी आलोचना को ध्यान में लेते हुए इस देश में बौद्ध धर्म के भविष्य को लेकर आशावादी हूं।
ब्रह्मा के मुंह से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैर से शूद्र के जन्म पर आधारित हिंदू धर्म की रचना इंसानियत को अपमानित करने वाली, बुद्धि का भेद करने वाली और ईश्वर से द्रोह करने वाली है। इस प्रकार की धर्मरचना में इंसानों के बीच कभी भी समता नहीं आ सकती। व्यक्ति का विकास कभी पूरा नहीं हो सकता। इसीलिए, पूरी तरह सोचने-विचारने के बाद मुझे लगता है निम्न वर्ग को ऐसी सोच के
जनताः 9 अप्रैल, 1955