331 3-4-1955 तानाशाही और मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव करने वाली संस्कृति ये प्रजातंत्रा के दो दुश्मन हैं - मुंबई - Page 399

380 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खिलाफ विद्रोह करना होगा, नहीं, उसे त्यागना ही होगा। इसका मतलब है कि इस प्रकार की सोच रखने वाले धर्म का त्याग कर समता और मानवीय एकता की सीख देने वाला बुद्ध का धर्म उसे अपनाना चाहिए। इसलिए अपने सभी बंधुओं को आखिरी बार मैं कह रहा हूं कि मुक्ति प्राप्ति के लिए बौद्ध धर्म की दीक्षा लें। पश्चिमी इतिहास को देखें तो पता चलता है कि राज्य और धर्म ( State & Church ) को अलग रख कर जितने युद्ध हुए वे उनके इतिहास की सबसे बड़ी गलतियां हैं। मानव के जीवन से धर्म को इस प्रकार अलग नहीं किया जा सकता। बल्कि धर्म मानवीय जीवन का सर्वांग है, अधिष्ठान है। सभी मामलों की वह अंतःप्रेरणा है। इस मामले को कोई विचारवान नजरंदाज नहीं कर सकता। ‘रोम का ”ास’ (‘Fall and Decline of Roman Empire’) गिबन की लिखी इस किताब का कुछ हिस्सा पढ़ें तो एक बात साफ तौर से ध्यान में आती है कि ईसाई धर्म की आहट सुनाई देते ही अभिजात वर्ग के अत्याचारों से तंग आकर छत के बिना शाम के भोजन की तलाश में सड़कों कीखाक छानते फिरनेवाले गुलामों ने ही उसे पहली बार जीवनमुक्ति (salvation) के तौर पर अपनाया। रोम में गुलामों ने ही ईसाई धर्म का पहला पगचिर्िं बनाया। यह एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक तथ्य (historical reality) है इसीलिए, आसपास के वातावरण का अवलोकन कर अपने पर होने वाले अन्याय (injustice) और अत्याचार (torture) से ही बौद्ध धर्म के बीजारोपण हुए बगैर नहीं रहेगा।

मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि हिंदू धर्म विषमता पर (Discrimination) आधारित है। दूसरा बड़ा पूर्वी धर्म है इस्लाम। बंधुभाव (Brotherhood) के लिए यह धर्म मशहूर है। लेकिन यह बंधुभाव केवल उनके धर्म तक ही सीमित है। बौद्ध धर्म सभी मानवों को समानता के अधिकार देता है। केवल इसी धर्म में मानव जीवन का योग्य आदर (Respect for human being) है। उसमें इस प्रकार का भेदभाव (Discrimination) नहीं है। बौद्ध धर्म ही सच्ची समता का धर्म है। मुझे बुरा लगता है मैंने इस कार्य को संपन्न करने के लिए मेरी ओर से देरी हो गई। वरना आज मुझे इस बीज की बुआई के फल देखने को मिलते। इस बारे में मुझे रत्ती भर का शक नहीं है कि मेरे समाज के 90 प्रतिशत लोग मेरे कथन से सहमत होंगे। आलोचक चाहे कुछ भी कहें मुझे इस बारे में कोई शक नहीं है कि इस देश में बौद्ध धर्म फिर से पुनर्जीवित होने वाला है इस बारे में मेरे मन में तिलमात्र की संदेह नहीं है।

कुछ लोग आलोचना करते हैं कि आजकल के युग में धर्म की जरूरत ही क्या है? मुझे लगता है कि ऐसे लोग मानवीय समाज की धारणा के लिए धर्म की कितनी आवश्यकता है यही बात भूल जाते हैं। मानवीय समाज को धर्म ने दो देन दी हैं-पहली, मानवीय जीवन में एकता साबित रखने के लिए मानसिक प्रेरणा का निर्माण करना। धर्म के कारण ही मानवीय एकता के लिए पोषक विशिष्ट प्रकार के माहौल का निर्माण होता है। दूसरी, मानवीय समूह में धर्म ही समानता का निर्माण कर सकता है। इन दो महत्वपूर्ण कसौटियों के कारण वर्तमान स्थितियों में समता का निर्माण कर अच्छी तरह से जनतंत्र को कामयाब करना हो तो धर्म बेहद जरूरी है।