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केवल बुद्ध ने मानवीय विवेक को जागृत किया

भगवान बुद्ध का जन्म, बुद्धत्व प्राप्ति और उनका परिनिर्वाण - ये तीनों घटनाएं वैशाख पूर्णिमा के दिन ही घटित हुई हैं इसलिए यह दिन विशेष रूप से मनाया जाता है। 1955 में यह दिनांक 5 मई को था। डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने यह दिन सोपारा में जहां बुद्ध अवशेष मिले थे वहां मनाना तय किया।

सोपारा पूर्व भारत के पश्चिम किनारे पर बसा महत्वपूर्ण बंदरगाह था। हजारों साल पूर्व अरबी यात्रियों द्वारा लिखे यात्रावर्णनों में सोपरिरा का जिक्र कुबेर नगरी के तौर पर किया है। हाल ही में सोपारा के पास अनुसंधानकर्ताओं को अशोक के शिलालेख मिले हैं। सोपारा के कारण ही बोरीवली के पास स्थित कान्हेरी गुफाओं में उस जमाने में बुद्ध विहारों की स्थापना हुई होगी। अनुसंधानकर्ताओं को उत्खनन करते समय सोपारा मेंखास बनाई गई इमारत में जतन से रखा गया बुद्ध का दांत मिला था। 1955 की वैशाख पूर्णिमा मनाने के लिए डॉ. बाबासाहेब ने इसी स्थान को चुना था। गिने-चुने लोग ही वहां उपस्थित थे। उस अवसर पर डॉ. बाबासाहब ने आम के पेड़ के नीचे आसन बिछा कर धर्म के बारे में जो विचार प्रकट किए उनका सारसंक्षेप यहां दिया जा रहा है।

‘‘आज मैं आप लोगों को भगवान बुद्ध के धर्म का सारांश बताने वाला हूं। बुद्ध द्वारा बताए गए धर्म को अगर छोड़ दें तो सभी धर्मों का निर्माण ईश्वर और आत्मा इस जोड़ी के सहारे ही किया गया है। भक्ति की तथाकथित पुण्यकर्मों का गट्ठर लेकर जाने वाले जीव की उससे मुलाकात होती है। परमात्मा और आत्मा के बीच का संबंध पक्का करने के लिए एक काल्पनिक आधार बनाया है। आत्मा ईश्वर में विलीन होती है। इस कच्ची बुनियाद परखड़ा यह परमात्मा-आत्मा काखोखला महल है। भक्ति के प्रकार हम जानते ही हैं। पूजन-अर्चन, धूप-दीप, मंत्र-तंत्र, जाप-तप, कर्म-कांड आदि मार्गों का भक्ति के लिए आधारित किया जाता है। इनके अलावा जीव-हिंसा और नरबलि जैसी अघोरी प्रथाएं भी हैं। भूतों को प्रसन्न करने के लिए कई मूर्खता करने जैसी विधियां भी हैं।

सबके मूल में एक ही कल्पना होती है और वह यह है कि जीव पापी होता है इसीलिए उसे जन्म लेना पड़ता है। पापक्षालन के लिए जीव अगर अपनी देह को तकलीफ दे, तप-त्याग करे तो ही ईश्वर से उसकी मुलाकात हो सकती है। इस प्रकार जीव का

प्रबुद्ध भारत, 3 मई, 1958, प्रस्तुत संक्षिप्त वृत्त आयु. वी पागराऊत ने लिखा है - कार्यकारी संपादक, जनता।