332 6-5-1955 केवल बुद्ध ने मानव की विवेक बुद्धि को आवाहन किया है - सोपारा - Page 401

382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उद्धार हो सकता है। जीवन-मष्त्यु के फेर से जीव को मुक्ति मिल सकती है। कमो-बेश इसी प्रकार की भ्रामक कल्पनाएं आत्मा और ईशवर का संबंध जोड़ने के लिए और उनका अस्तित्व साबित करने के लिए सब दूर फैलाई गई हैं। बौद्ध धर्म में आत्मा के लिए कोई स्थान नहीं है और ईश्वर भी नहीं है।

बौद्ध धर्म के अलावा अन्य किसी भी धर्म को लीजिए, हर धर्मानुयायी और उनके प्रमाण ग्रंथ यही बताते हैं कि उस धर्म की स्थापना ईश्वर द्वारा की गई है। जिनके द्वारा ईश्वर ने धर्म बताया जाता है वे धर्मप्रवर्तक ईश्वर के प्रेषित अथवा दूत माने जाते हैं। ईसाई धर्म के संस्थापक ईसामसीह, यहूदी धर्म के प्रणेता मोझेस और इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मोहम्मद में से हरेक ने अपने को ईश्वर का संदेश लोगों तक पहुंचाने वाल दूत होने की बात कही है । प्रेषित की भूमिका ईश्वर-मानव संबंधों में पोस्टमेन से अलग नहीं दिखाई देती। भेजे गए मानव होते हुए भी ईश्वर के आदेश वह मानवों को बताता है इसलिए उसके द्वारा व्यक्त किए गए विचार, उसके मुंह से निकलने वाली बातें और उसके वचन संशयातीत माने जाते हैं।

इस प्रकार प्रेषितों द्वारा बताए गए ईश्वर प्रणीत वचनों पर सोचने-विचारने की राह ही रोक दी गई। जिज्ञासा को संतुष् करने के लिए और सच-झूठ की कसौटी पर उनकी पड़ताल करने के साधन ही समाप्त कर दिए गए।

भगवान बुद्ध ने धर्म के बारे में बताते हुए यह कभी नहीं कहा कि मैं कह रहा हूं केवल इसलिए बौद्ध धर्म स्वीकारें। उल्टे, उन्होंने कहा है कि आपकी बुद्धि को ठीक लगे तभी इसको स्वीकार करना। इस प्रकार उन्होंने मनुष्य की बुद्धि का आह्नान किया है। बौद्ध धर्म जांच-परख के बाद बताया गया धर्म है। रोग की पुष्टि के बाद दी गई दवा है। भगवान बुद्ध ने पहले मानव जाति के रोग को जाना। इस जांच से पाया जवाब कि दुनिया में दुख और दरिद्रता ये दो महाभयंकर रोग हैं। इसी को बौद्ध धर्म का अधिष्ठान कहा जा सकता है। अब यह सवाल पैदा होता है कि दुख और दरिद्रता के रोगों को कौन-सा धर्म नष्ट करता है? जो धर्म दुख और दरिद्रता को हमेशा के लिए नष्ट करने का प्रभावी और असरदार मार्ग नहीं बताता वह धर्म हो ही नहीं सकता। क्योंकि धर्म सभी मनुष्यों द्वारा सोच-समझकर स्वीकारा तथा समाजधारण के लिए है।

अन्य धर्मों में मरने के बाद क्या होगा इसी बात पर ज्यादा विचार किया गया है। वे केवल यही हर वक्त सोचते रहे। मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा या नर्क यह डर लोगों की गर्दन पर सिंदबाद की गर्दन पर सवार बूढ़े की तरह बैठा कर आलसी, धूर्त और लोगों को लूट करखाने वाले लोगों ने धर्म को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। मृत्यु के बाद के हालात का काल्पनिक, रंगीन चित्र बना कर भय निर्माण करना और लोगों को मुश्किल में डालना और अपनी वंश परंपरा को, अपनी अय्याशी को जारी रखने