383
का एक व्यवसाय ही चालाक और धूर्त लोगों को मिला। मरने के बाद जो होना है सो होगा लेकिन जो कष्टमय है उसे सुखमय करने का सवाल मृत्यु के बाद वाले काल्पनिक सवालों के बारे में सोच-विचार कर कैसे मिलेगा? इस प्रकार अगर सोचा जाए तो अकेले बुद्ध ही यथार्थवादी थे। उन्होंने दुख के कारण ढूंढे। वे तीन प्रकार के हैं - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक।
आध्यात्मिक अर्थात् निजी। व्यक्ति द्वारा अपने कर्मों के कारण जो दुख अपनी तरफ
खींच लिया है वह, अपने कर्मों से निर्मित दुख है। शराबी व्यक्ति शराब पीकर अपने शरीर को हानि पहुंचाता है, अपने परिवार को नष्ट कर देता है उसे आध्यात्मिक दुख कहा जा सकता है।
आधिभौतिक अर्थात् सामुदायिक दुख। असमान बर्ताव और अन्याय के कारण जो संकट आते हैं, जैसे कि अस्पृश्यों के हिस्से आने वाले सामाजिक दुख, समान मौके न मिलना आदि इसमें शामिल हो सकते हैं।
आधिदैविक अर्थात् प्राकृतिक दुख। रेल, हवाई जहाज, पानी के जहाज, मोटर आदि के कारण होने वाली दुर्घटनाएं, तूफान, महामारी, बाढ़ आदि विपत्तियों के कारण निर्माण होने वाले दुख। इन दुखों को दूर करने के लिए साधन बताया है - पंचशील। किसी की जान न लें, चीजें आदि न चुराएं, झूठ ना बोलें, व्यभिचार न करें और शराब या तत्सम अन्य किसी नशीली चीजों का सेवन ना करें। इन पांच नियमों का पालन करने से दुखों का निर्माण ही नहीं होगा।
आधिभौतिक दुखों से छुटकारा पाने के लिए श्रेष्ठ अष्टांग मार्ग का अवलंब करें -
- सम्यक दृष्टिवा, 2. सम्यक संकल्प, 3. सम्यक वाचा - चुगली न करें, 4. सम्यक कर्म, 5. सम्यक आजीवन बुरे कर्मों से पैसा कमा कर उपजीविका न कमाना 6. व्यायाम कसरत - अच्छे विचारों को बढाएं और बुरे विचार मन में आने न दें, बुरे विचार आएं तो उनका नाश करना, 7. सम्यक स्मृति - शरीर के सुख-दुखादि वेदनाओं का बार-बार अवलोकन करना, 8. सम्यक समाधि - किसी भी दुष्ट मानसिकता से मन को अलग रख कर मन को हमेशा प्रसन्न और शांत रखना।
इसमें से सम्यक दृषि् का महत्वपूर्ण स्थान है। हम जो काम करते हैं उससे केवल अपना ही लाभ हो इस बात पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपना हित साध्य करते हुए किसी की हानि तो नहीं हो रही, किसी को नुकसान तो नहीं पहुंच रहा इस बात काखयाल रखा जाए तो दुनिया के आधिभौतिक दुखखत्म होंगे।
इन्हीं के साथ दस पारमिता भी बताई गई हैं। पारमिता अर्थात् जितना हम कर पाते हैं उतना। इन पारमिताओं में प्रज्ञा श्रेष्ठ है। हर पारमिता को प्रज्ञा की कसौटी पर कसना