332 6-5-1955 केवल बुद्ध ने मानव की विवेक बुद्धि को आवाहन किया है - सोपारा - Page 403

384 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ही चाहिए। प्रज्ञा को अंग्रेजी में विज्डम कहा जाता है। प्रज्ञा का इस्तेमाल न कर आदमी मूर्खों की तरह कैसे बर्ताव करता है इसका एक उदाहरण मैं आपको बताता हूं।

एक छोटे से गांव में एक पादरी रहता था। संकट आने पर घुटने टेक कर प्रार्थना करनी चाहिए इतना ही उसे पता था। एक बार उस गांव के झोंपडियों में आग लग गई। पादरी वहां गया और सबको इकट्ठा कर प्रार्थना करने लगा। जाहिर है कि आग से सभी झोंपडि़यां जल करखाक हुईं। प्रज्ञा का अगर उसने थोड़ा इस्तेमाल किया होता तो तुरंत बाल्टी उठा कर चल देता और औरों को प्रार्थना में न लगाता तो शायद आग से कई झोंपडि़यां बचाई जा सकती थीं।

शील और नैष्कर्म का परस्पर संबंध है। संकटग्रस्त लोगों को बचाने के लिए प्रयत्नों की शिकस्त करने को दान पारमिता कहते हैं। लोगों के कल्याण के काम उत्साह के साथ और तत्परता से करने को वीर्य पारमिता कहते हैं। क्रोध अपने आप आता है लेकिन क्षमा का गुण कोशिश कर प्राप्त करना पड़ता है। सत्य न हो तो लाचारी और चापलूसी की मानसिकता बनती है। अधिष्ठान यानी दृढ़निश्चय। जिस प्रकार बड़े मामलों में रखा जाता है उसी प्रकार छोटे-छोटे मामलों में भी उसे रखना चाहिए। सब पर एक-सा प्रेम करने को मित्रता और शुभ कार्य में रुकावट पैदा न करने को उपेक्षा पारमिता करते हैं।

पंचशील, आर्य अष्टांगिक मार्ग और ये दस पारमिता दुख का निरोध कर दुख का नाश करने में समर्थ हैं। दुनिया के दुख का निवारण हो यही बुद्ध धर्म का सार है। हम भारतीयों को अपने दर्शन पर बहुत गर्व है। लेकिन पिछले एक हजार सालों से एक भी सिद्धान्त शास्त्री अथवा दार्शनिक पैदा नहीं हुआ है। तत्वानुसार चिंतन कर कोई सिद्धांत प्रस्तुत करने के लिए विद्वानों की जो मानसिकता होनी चाहिए वह अब नहीं रहने के कारण विद्वान विचार-विनिमय और विचारों के लेन-देन से अलग हुए। इससे विद्वानों की बुद्धि छोटे-छोटे दड़बों में बंद होकर कुंठित हुई। इस कारण सत्य कीखोज और सत्य को ग्रहण करने का कार्य बंद होकर पंडितों के बजाय किताबी कीड़ों का वर्ग निर्माण हुआ।

ज्ञान की कुंजी

बताएं एक बारी में

ऐसी कल्पना नष्ट हुई

कई सारे ग्रंथ पढ़ कर फायदा क्या? गधे की पीठ पर किताबें लादने से उसे जितना लाभ होगा उतना ही लाभ ऐसे पठन से हो सकता है। ग्रंथ पढ़कर उसका आशय ग्रहण करने की शक्ति होनी चाहिए। नित नई कल्पनाएं सूझनी चाहिएं। सिद्धांत समझना, ग्रहण करना आना चाहिए।

आज चाहे कोई भी विषय या विज्ञान लीजिए, साहित्य, दर्शन, अर्थविज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान, विज्ञान, राजनीति, युद्धनीति आदि किसी भी ज्ञान की शाखा को ही लीजिए।