332 6-5-1955 केवल बुद्ध ने मानव की विवेक बुद्धि को आवाहन किया है - सोपारा - Page 404

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भारतीय के तौर पर जो भी कुछ है वह पूर्णता को अभी पहुंचा नहीं। वैसे भी ज्ञान कभी भी पूर्णत्व को प्राप्त नहीं करता। आज परिपूर्ण लगने वाला ज्ञान का अंग या शाखा भविष्य में अपूर्ण लगेंगी ही क्योंकि हर दिन उसमें बढ़ोतरी होती रहती है, उसमें और भी कुछ-कुछ जुड़ता रहता है। मेरे कहने का उद्देश्य यही है कि इस देश के विद्वानों ने नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, उज्जयिनी, अवन्ती इन वैश्विक कीर्ति प्राप्त तत्कालीन विश्वविद्यालय के आचार्यों ने जो ज्ञानसंचय किया उसमें पिछले हजार सालों में नया कुछ तो जुड़ा ही नहीं साथ ही ‘जो-जो अपने को पता हो वह सब दूसरों को सिखा कर सबको सयाना बना देना चाहिए’ इस उक्ति के विरुद्ध आचरण करने के कारण जो ज्ञान मूल में था उसका भी लोप हुआ। शिष्य को ज्ञान देते हुए गुरु को कुछ अपने लिए बचा कर रख चाहिए। गुरु अगर सौ इलाज जानता हो तो निन्यानबे चीजें चेले को देकर एक गुरुचाबी अपने हाथ में रखें इस प्रकार की सोच फैलने से ज्ञान का ”ास होकर केवल विकृत रूप बाकी रहा। मनुष्य को निर्वाण का पद प्राप्त आना चाहिए। धम्मपद में कहा गया है - निब्बाणं परम सुखं। अपने पास बहुत सारी संपत्ति है इसलिए सुख की प्राप्ति नहीं होती। केवल पांडित्य से व्यक्ति सुखी नहीं होता। वह दुखी नहीं होता लेकिन सुखी भी नहीं होता क्योंकि अति लोभ,खून, चोरी, पर स्त्रीगमन आदि विकार मनुष्य को जन्म के साथ ही मिलते हैं इसलिए उन पर नियंत्रण रखना आना चाहिए।

भगवान कहते हैं मानव जलती हुई आग है। इसी आग के कारण विकार पानी की तरह उबलते रहते हैं। अग्नि को चेताया जा सकता है या उसे शांत किया जा सकता है। विकारों को नष्ट किया जा सकता है लेकिन उन्हें जड़ से उखाड कर फेंका नहीं जा सकता। अग्नि का उपयोग करने के लिए उसे मंद रख कर अनाज उस पर पकाना पड़ता है उसी प्रकार मानव का उपयोग समाज के लिए हो इसके लिए बीच की स्थिति है निर्वाण। इससे मनुष्य दस विकारों के अधीन न जाकर तर्कशुद्ध विचारों के साथ समाज के लिए उपयोगी कार्य कर सकता है।

जिन्होंने धर्म के सिद्धांतों के बारे में चर्चा की उन्होंने उसे इतना गुप्त रखा कि भगवंत को बताना पड़ा। महिलाएं, झूठे धर्ममत और भट-ब्राह्मणों की पोथियां ये तीन चीजें ही गुप्त रखी हैं। इसके बावजूद - श्रुतीविभिन्ताः स्मष्तिविभिन्ताः

धर्मस्व तत्वं नि हितं गुहायां

महाजनो येन गतस्य पंथः

धर्म के सिद्धांतों की - पीछे से चली आई आगे चली गई, ऐसी स्थिति बनाई गई। श्रुति कुछ और बताती हैं, स्मृतियां कुछ और ही उपदेश करती हैं। धर्म के तत्व बहुत ही गहन और गूढ़ हैं फिर करें क्या? तो, चार बड़े लोग जिस राह से जाते हैं उसी राह को अपनाओ। भगवान बुद्ध ने कहा है कि केवल मैं कहता हूं इसलिए नहीं वरन् आपकी