387
असर हुआ तो फल अच्छा आएगा, बुरा असर हुआ तो फल भी बुरा ही आएगा। बीज शुद्ध हो तो फल अच्छा ही होगा। इसीलिए किसी प्रांत में विशिष्ट फूलों की फलती है अन्य जगह ले जाने पर वह जिंदा भी नहीं रहते। जैसे चाय नीलगिरी के बागानों में कॉफी असम अच्छे संतरे नागपुर में ही पैदा होते है, नारियल समंदर किनारे ही बढ़ते हैं, हापुस आम रत्नागिरी का ही स्वाद और रस में बेहतरीन होता है। मसालों के लिए जावा द्वीप मशहूर है। इसलिए कुल पुनर्निर्माण के काम को ही पुनर्जन्म कहा गया है। लेकिन पुनर्जन्म शब्द का सहारा लेकर कहा जा रहा है कि आत्मा को बौद्ध दर्शन में मान्यता है, वह गलतफहमी ही है।
ब्राह्मण और बौद्ध धम्म कर्म का अर्थ अलग-अलग लगाते हैं। कर्म महत्वपूर्ण बात है। इस दुनिया का कामकाज कैसे चल रहा है? ब्राह्मण ग्रंथ बताते हैं कि भगवान चलाते हैं। उसे ब्रह्मा भी कहते हैं। अन्य धर्म भी ईश्वर, अल्ला, गॉड के नाम से इसी कल्पना की पुष्टि करते हैं। बौद्ध धर्म में ईश्वर नहीं है। बौद्ध धर्म बताता है कि दुनिया हरेक के कर्म के अनुसार चलती है। इसलिए बौद्ध धर्म ने मनुष्यों पर जिम्मेदारी डाली है। जैसा करोगे वैसा ही पाओगे ऐसी चेतावनी दी। इसे कर्मविपाक कहते हैं। क्रमविपाक यानी हमारे कर्मों से निर्माण होने वाले फल। बौद्ध धम्म में कर्म का मतलब पिछले जन्म में किए पाप-पुण्यों की गठरी ऐसा नहीं लगाया जाता। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जिसके परिणाम तुरंत भोगने नहीं पड़ते। उस कर्म का, क्रिया का असर कुछ समय बाद होता है। लेकिन जन्मांतर से नहीं, क्योंकि बौद्ध धर्म पुनर्जन्म को नहीं मानता।
इसलिए कहा जा सकता है कि बौद्ध धर्म ने मनुष्य के अच्छे गुणों को बढ़ाने के लिए अवसर रखे हुए हैं। मनुष्य को अपनी प्रगति के लिए, अपनी उन्नति के लिएखुद ही कोशिश करनी पड़ेगी ऐसा कहा है। मेरे माथे पर यही लिखा है, यही मेरा विधिलिखित है, यह ब्रह्मा की खींची लकीर है, कह कर निराश होने की जरूरत नहीं है। अपने उद्धार की कोशिश करना चाहिए यह राजमार्ग बौद्ध धर्म बताता है। संचित, पूर्व जन्म के कर्मों का फल यह मनुष्य को निष्क्रिय बनाने वाला, उसके धीरज कोखत्म करने वाला सफेद झूठ है।
पूर्व जन्म की कल्पना के कारण पापकर्म करने को बढ़ावा मिलता है। पिछले जन्म में किया हुआ पुण्य है, सो इस जन्म में पाप करने में हर्ज ही क्या है ऐसा विचार थोड़े अच्छे घर के व्यक्ति के मन में आता है। लेकिन इस प्रकार सोचने वाला आदमी मानव जाति के लिए नुकसानदेह होता है। पतित भी दो तरह के होते हैं। एक वह जिसे यह अहसास होता है और हमेशा उसका मन उसे कुरेदता रहता है कि वह पतित है, दूसरा पतित वह होता है जिसे अपने पाप कर्मों के बारे में बुरा नहीं लगता। हमेशा पिटने वाला पिटने से नहीं डरता कुछ उसी तरह।