390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लिए मैं आपका अभिनंदन करता हूं। आपने नई शुरुआत की है, हर साल बुद्ध जंयती इसी प्रकार मनाते रहेंगे ऐसी उम्मीद करता हूं।
आज मैं अन्य बातों का जायजा लेने वाला हूं। पिछले एक महीने से मैं मुंबई में हूं। मुंबई के अखबार मैं पढ़ता हूं। कुछ मुझे इनकी कटिंग्स भी भेजते हैं। बौद्ध धर्म स्वीकारने को लेकर कई लोगों की राय पढ़ने में आती हैं। लगभग हर अखबार में आलोचना आती है, कहा जाता है कि - अस्पृश्य लोगों को इस काम के लिए बरगलाया जा रहा है, उनके अज्ञान का फायदा उठाते हुए डॉ. अम्बेडकर उन्हें बहका रहे हैं, उस धर्म को अपनाने के बाद आपका नुकसान होगा, डॉ. अम्बेडकर पागल है, उसके जाल में मत फंसना, अगर उसकी बातों में आओगे तोखड्डे में जाओगे वगैरेह बातें कही जाती हैं। सार्वजनिक काम में आलोचना करने का अधिकार सबको है ऐसी बात नहीं कि मुझे इस बात काखेद है। मेरा जीवन लोगों की आलोचना सहने में बीता। छोटे बच्चे को नजर न लगे इसलिए जैसे उसकी मां काजल का टीका लगाती है उसी प्रकार ये लोग मुझे हमेशा कालिख लगाते हैं। मुझे इस बात का कुछ बुरा नहीं लगता।
हममें से कई लोग अज्ञानी और कुछ लोग ज्ञानशील हैं। उनपर अखबारों में लिखे का असर होता होगा। इसलिए अखबारों में जो लिखा जाता है उस पर टीका-टिप्पणी जरूरी है। हालांकि, मैं एक बात आपको बताना चाहता हूं कि सोचिए, आलोचना करने का हक किसे पहुंचता है? कौन किसकी आलोचना करे? जिसके पास सहानुभूति है उसी को आलोचना करने का अधिकार भी है।
सुरक्षा करने वाले को ही आलोचना करने का अधिकार है। जान से मार डालने वालों को आलोचना करने का अधिकार नहीं।
भगवान बुद्ध का चचेरा भाई देवदत्त शिकारी था। उसे शिकार करने का शौक था। तीर-कमान लेकर वह पंछियों का शिकार करता था। भगवान बुद्ध अहिंसा के पुजारी। देवदत्त की करनी भगवान को पसंद नहीं थी। वह कहते- निरपराध जानवरों की जान मत लेना। अन्य लोग उनसे कहते, तुम नामर्द हो। तुम क्षत्रीय नहीं हो।
एक बार देवदत्त ने शिकार के लिए जाना तय किया। तब बुद्ध ने कहा, मैं भी तुम्हारे साथ शिकार पर चलूंगा। लेकिन मैं एक तरफ बैठा रहूंगा। आप लोग शिकार करें। वे शिकार के लिए निकले। भगवान बुद्ध एक पेड़ के नीचे बैठे। देवदत्त वहां से चला गया। कुछ समय बाद जब आकाश से एक पंछी नीचे गिरा। भगवान बुद्ध वहां बैठे थे। उन्होंने गिरता पंछी देखा। उस पंछी को तीर लगा था। भगवान ने उसके सीने में गड़ा तीर निकाला, उसे पानी पिलाया। अपनी छाती से चिपकाकर उसे गरमाहट दी। उसे होश में ले आए। तब तक देवदत्त पंछी कोखोजता हुआ वहां आया। उसने भगवान बुद्ध से पूछा, एक उड़ते पंछी को मैंने तीर मार कर गिराया। वह कहां गिरा क्या तुम्हें