333 8-5-1955 बौद्ध धर्म और हिंदु धर्म में जमीन-आसमान का फर्क है - परेल (मुंबई) - Page 410

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पता है? वह तुम्हारे आसपास ही गिरा होगा। भगवान ने कहा, पंछी मेरे पास है। उसके पेट में बाण था जिसे मैंने निकाल दिया। उसके जख्म को धोया, गरमाहट देकर उसे होश में ले आया।

देवदत्त ने कहा, यह मेरा पंछी है। इस बात को लेकर विवाद हुआ। देवदत्त ने कहा, शिकार का यह नियम है कि जो जानवर को मारता है वह उसका मालिक होता है। मैंने इसे मारा है इसलिए मैं इसका मालिक हूं। बुद्ध ने कहा, जो मृतप्राय जीवन की रक्षा करता है वही उसका मालिक होता है। मैं इसका मालिक हूं। जो मारनेवाला होता है वह उसका मालिक नहीं होता। दोनों में लंबे समय तक विवाद हुआ। दोनों ने बात पंचायत के सामने जाना तय किया। दोनों ने अपना पक्ष पंचायत के सामने बयान दिया। पंचायत ने बुद्ध के पक्ष में निर्णय दिया। जो रक्षा करता है वही असली मालिक होता है। यही असली नीति है।

इसीलिए अखबार वालों से मैं यह पूछना चाहता हूं कि आप हमारे रक्षक हैं या भक्षक? आप हैं कौन? हजारों सालों से हम समाज में रह रहे हैं। कोई सामने आकर बताए कि हमने अस्पृश्यों के लिए कुछ किया। अस्पृश्यों के उद्धार के लिए जिन्होंने अपनी एक उंगली तक उठाने का कष् नहीं किया उन्हें आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। मैं ऐसे लोगों से कहना चाहता हूं कि, मुंह बंद करके बैठें। हमें अगर गड्ढे में गिरना हो तो हम गिरेंगे। अब तक आप लोग हमें गड्ढे में ढकेलते आए हैं अब हमेंखुद जाकर गड्ढे में गिरने की आजादी दीजिए। गड्ढे में गिरने का अधिकार, गलतियां करने का अधिकार हमें दीजिए। आपने किसी प्रकार की मदद नहीं दी। क्या आपने कभी अस्पृश्यों के बच्चों को विलायत भेजा? उन्हें ये जो स्कॉलरशिप्स मिलती हैं वे मैंने दिलाई हैं। ये ऊसर जमीनें क्या आपने अपनी मर्जी से दी हैं? हम अपने पैरों परखड़े रहेंगे। हिंदुओं ने हमारे लिए क्या किया? उन्होंने एक ही सुधार किया, वह यह कि रेल से सफर करते हुए वे हमारे डिब्बे में बैठते हैं। वह भी इसलिए कि उन्हें पता नहीं होता। (हंसी)

पेशवा के समय में कौन किस प्रकार के कपड़े पहने इस बारे में कानून थे। मेरी मां बताया करती थी, महार अगर कपड़ाखरीदना चाहते थे तो उन्हें उसे दूर से ही देखना होता था दूर से ही कीमत पूछनी होती थी। दुकानदार दुकान में ही कपड़ा हिलाया करता उस आदमी ने अगर कपड़ाखरीदा तो लोटे में पानी ले आता, कपड़े पर छिड़कता, नया कपड़ा कीचड़ में घसीटता क्योंकि, महार नया कपड़ा नहीं पहन सकते! मिट्टी में घसीटी हुई साड़ी में दो उंगलियां फंसा कर उसे दो फाड़ करते। फिर महार पैसे रखता और कपड़ा लेकर जाता। हम लोग लंगोट पहनते हैं। पेशवा का ही वह हुकूम था। ब्राह्मण दोनों तरफ से झालरवाली धोती पहनते, ब्राह्मणेतर केवल पीछे की तरफ झालर बना सकते थे। भंडारी लोग बड़ा रूमाल कूल्हों पर लपेटते - ऐसे नियम थे।