333 8-5-1955 बौद्ध धर्म और हिंदु धर्म में जमीन-आसमान का फर्क है - परेल (मुंबई) - Page 412

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लगे तो प्रजा किसके पास जाए? भूस के लड्डू, जिसनेखाए वह फंसा, जिसने नहीं

खाए वह भी फंसा।

मैं पढ़े-लिखे लोगों से कहना चाहता हूं। महार लोग क्या किया करते थे? रात में उठ कर वे घूमते। सुबह का कुछ बचा-खुचा रात मेंखाते। फलटण गांव में महार थे। उनके पास 24 बीघा जमीन थी। वहां एक मंदिर था। उसमें भंडारा हुआ करता था। हमारे एक मंत्री थे। इस भंडारे में वह एक गाड़ी भर लड्डू, जलेबी, रोटियां आदि दिया करते थे। महार लोग मंदिर के दरवाजे के पास बैठते और झूठन लेकर जाते। इतना मिलने के बाद महारों को जमीन पाने की जरूरत ही क्या थी? कुछ दिनों के बादखाना देना बंद कर दिया गया तब इन महारों ने कहा, ‘हमारी इतनी जमीन थी। मराठों ने वह हडप ली।’ मंदिर से झूठन मिला करती थी वह भी बंद हुई। ऐसी उनकी हालत थी।

जलगाव में श्राद्ध होता तो महार भिखारियों की तरह कचरे पर बैठते। लोग मुझसे कहते - ये तो ईसाई बना, इसका निवाला छिन गया। इसका अब कैसे होगा? मेरा एक ब्राह्मण विरोधी था। वह हर रोज का हिसाब बताता। जानवरों का मांस, सींग, चमड़ा, हड्डियां आदि की दो-चार हजार की कीमत बताता और कहता, ‘डॉ. अम्बेडकर ने महारों का इतना नुकसान किया।’ यह केसरी में छप कर आता। हालांकि मैंने कभी इसका जवाब नहीं दिया।

एक बार संगमेश्वर में सभा थी। महारों की सभा में इस ब्राह्मण ने मेरी पूछताछ की। मैंखानाखाने बैठा था। मैंने कहलवाया,खानाखाने के बाद आता हूं। यह भी कहलवाया कि अगर उनके पास समय हो तो वह अंदर आ सकते हैं। उस आदमी ने कहा, काम थोड़ा है लेकिन महत्वपूर्ण है। उसने कहा, ‘‘आप इन सभी लोगों से कहते हैं कि मांस मतखाइए, मरे जानवरों को मत उठाइए, महारों का आप यह जो नुकसान कर रहे हैं क्या यह ठीक है?’’ मैंने कहा, ठीक है। पूछा, आपके सवाल का जवाब मुझे अभी देना है या सभा में दूं? उसने कहा, सभा में जवाब दीजिए। मैंने लोगों से कहा, इन्हें सवाल पूछने हैं, आप उनके सवालों पर ध्यान दीजिए। उन्होंने हिसाब लगा कर बताया कि आपका आंदोलन नुकसानदायी है। उसका हिसाब सही था। उनका कहना था कि उनका एक हजार रुपयों का नुकसान हो रहा है। उनका यही सवाल था। मैंने उनसे कहा, मैं आपको एक हजार रुपए देने के लिए तैयार हूं। आप अगर मरे जानवर ढोएंगे तो एक हजार रुपयों का इनाम भी दूंगा। लेकिन उनके साथ आपको काम करना होगा।

स्वाभिमान बहुत जरुरी है। कोई महिला कामाठीपुरा जाए तो सोने-चांदी के गहने लाती है और सुबह होटल वाले को पुकार कर कहती है - ए, आधा प्लेट कीमा, एक स्लाइस रोटी लाओ। चार बजे चाय। शाम को पौडर लगा कर बैठना। वहां का जीवन सुखमय होता है। लेकिन वेश्या का कोई मान नहीं। उसकी कोई इज्जत नहीं इस बात