334 12-12-1955 विद्या, प्रज्ञा, करुणा, शील और मैत्री इन पांच तत्वों के आधार से हर छात्र अपना चरित्र बनाए - औरंगाबाद - Page 416

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विद्या, प्रज्ञा, करुणा, शील और मैत्री इन पांच तत्वों के आधार से

हर छात्र अपना चरित्र बनाए

औरंगाबाद के मिलिंद महाविद्यालय के बोधि मंडल की तरफ से 12 दिसंबर, 1955 के दिन सभा बुलाई गई थी। इस सभा में मार्गदर्शन करने के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को बुलाया गया था। उन्होंने अपने भाषण में सबसे पहले आयु. शंकरराव देव द्वारा दिनांक 7 दिसंबर, के दिन महाविद्यालय में हुए भाषण में कहे गए एक वाक्य पर टिप्पणी की। आयु. शंकर राव देव ने भाषण में कहा था कि, ‘‘महाविद्यालय का केवल ‘मिलिंद ’नाम देकर नहीं चलेगा। अक्रोध से क्रोध को जीतने वाली बौद्ध शिक्षा का अगर पालन किया गया तो ही यह नाम सार्थक होगा।’’

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने आयु. देव के इस कथन पर कहा-

मिलिंद ग्रीक था। उसे अपनी विद्वत्ता को लेकर घमंड था। उसे यह भी लगता था कि ग्रीकों की तरह के विद्वान दुनिया में और कहीं नहीं हो सकते। उसने दुनिया को चुनौती भी दी थी। उसे लगा कि किसी बौद्ध भिक्षु के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए। लेकिन उसके साथ चर्चा के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। मिलिंद औसत दर्जे का आदमी था। वह दार्शनिक नहीं था और न ही विद्वान था। उसे बस इस बात का पता था कि राज्य कैसे चलाया जाना चाहिए। लेकिन ऐसे मिलिंद के साथ विचार-विमर्श के लिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। महती प्रयासों के बाद से नागसेन नामक भिक्षु को तैयार किया गया। सफलता मिले या न मिले, मिलिंद की चुनौती को स्वीकारना चाहिए ऐसा उसे लगा।

नागसेन ब्राह्मण था। उम्र के सातवें साल में उसने अपने माता-पिता का घर छोड़ दिया था। ऐसे नागसेन ने भिक्षुओं का आग्रह माना। फिर मिलिंद और नागसेन के बीच तर्क-वितर्क हुआ और उसमें मिलिंद हार गया। इस चर्चा पर बहस की एक किताब प्रकाशित हुई है। इस किताब का पाली भाषा में नाम है - ‘मिलिंद पन्ह’। इसका मराठी में अनुवाद भी उपलब्ध है जिसका नाम है - ‘मिलिंद प्रश्न। इस किताब को अध्यापक और छात्र सभी अवश्य पढ़ें ऐसी मेरी इच्छा है। उसमें यह बताया गया है कि अध्यापक में कौनसे गुण होने चाहिएं। इसीलिए मैंने और मेरी सोसाइटी ने इस कॉलेज का नाम ‘मिलिंद महाविद्यालय’ रखा है। इस जगह का नाम दिया है- ‘नागसेन वन।’ उस बहस

जनताः 17 दिसंबर, 1955