334 12-12-1955 विद्या, प्रज्ञा, करुणा, शील और मैत्री इन पांच तत्वों के आधार से हर छात्र अपना चरित्र बनाए - औरंगाबाद - Page 417

398 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में मिलिंद हारा और उसने बौद्ध धम्म स्वीकारा इसलिए मैंने यह नाम नहीं दिया है। इस कॉलेज का मैंने जो नाम रखा है वह मेरी राय में आदर्श नाम है।

किसी शिक्षा संस्था को केवल पैसे दिए इसलिए किसी अमीर का नाम देना सर्वथः अनुचित है।

बौद्ध धर्म के साथ जुड़े मिलिंद इस नाम का महाविद्यालय के नाम के लिए चुनाव करने के पीछे एक और कारण है। वह है, विद्या सभी इंसानों के लिए उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार अनाज आवश्यक होता है। प्रत्येक को लाभ मिलना चाहिए। इस उदार विचार को अगर पहली बार किसी ने उद्घोषित किया हो तो वह हैं भगवान गौतम बुद्ध। जिन अनगिनत लोगों को कितने ही शतकों तक अज्ञान में दबा कर रखा गया उन्हें सुविज्ञ बनाने की शुरुआत करते हुए बुद्ध का अथवा उसके शिष्य का नाम याद आना सहज स्वाभाविक है।

मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में 2900 और इस कॉलेज में 600 छात्र हैं। मैंने इस कॉलेज का भार बहुत वहन किया है।

कॉलेज का नाम मिलिंद दिए जाने को लेकर धम्मपद का एक श्लोक श्री शंकरराव देव ने आपको बताया। वह इस प्रकार है-‘अक्रोधेन जेयत् क्रोधं’। उन्होंने कहा है कि क्रोध को अक्रोध से जीतना चाहिए। मैं बहुत गुस्सैल हूं यह पूरी दुनिया जानती है। आयु. देव कहते हैं, इंसान को अपने मन से क्रोध को निकाल देना चाहिए। आयु. देव कहते हैं इंसान को क्रोध को निगलना चाहिए। मुझे लगता है कि आयु देव का पठन कुछ अधूरा है। उन्होंने ठीक से पढ़ा नहीं है। (तालियां) भगवान बुद्ध ने राग यानी क्रोध पर जो व्याख्यान दिया है उसे अगर वह पढ़ते तो इस प्रकार के उद्ागर वह नहीं निकालते। इंसान अगर क्रोधी हो तो उसकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। क्रोध दो तरह के होते हैं- द्वेषमूलक और प्रेममूलक। कसाई कुल्हाड़ी लेकर जाता है। उसका गुस्सा द्वेषमूलक होता है। मां अपने बच्चे को अगर चपत लगाती है तो उसके गुस्से को कोई क्या कहेगा? उसका गुस्सा प्रेममूलक होता है। बच्चा सदाचारी हो इसलिए माता बच्चे को मारती है। मेरा गुस्सा भी प्रेममूलक है। आप समता से पेश आए इसलिए मैं राजनीति में अपशब्द कहता हूं। मेरी आलोचना करने वाले लोगों की मैं बिल्कुल परवाह नहीं करूंगा। (तालियां) मैंने जो कुछ भी किया है सब संघर्ष से ही किया है।

पहले केवल ब्राह्मण जाति के लोग ही विद्या प्राप्त करते थे। हम विद्या प्राप्त नहीं कर पाए। हम विद्या चाहते थे लेकिन ब्राह्मणों ने उसे हमें लेने नहीं दिया। भगवान बुद्ध ने यह परिपाटी तोड़ी।

एक बार भगवान बुद्ध से लोहित नाम के एक ब्राह्मण ने सवाल पूछा कि तुम सबको