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मराठवाड़ा के विकास के लिए उचित यही होगा
कि मराठवाड़ा आजाद हो
मिलिंद महाविद्यालय, औरंगाबाद के वार्षिकोत्सव के अवसर पर अध्यक्ष के नाते डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने 21 दिसंबर, 1955 को भाषण दिया। उन्होने कहा-
बहनों और भाइयों,
मुंबई शहर के औद्योगिक क्षेत्र के अधिकतर कामगार और लगभग सभी कचहरियों के कर्मचारी महाराष्ट्रीयन है और शहर के विकास के लिए वह लगातार मेहनत करता है।
मिल मजदूर बन कर काम करने वालों में और कचहरियों में काम करने वालों में पारसी लोगों की संख्या बहुत कम है। महाराष्ट्रीयनों के बगैर मुंबई शहर का विकास संभव नहीं है यह मेरी पक्की राय है।
महाराष्ट्र मेरी कल्पना में पश्चिम महाराष्ट्र, मध्य महाराष्ट्र और पूर्व महाराष्ट्र इन तीन हिस्सों का मिला हुआ राज्य है और उसी क्रम से मुंबई, औरंगाबाद और नागपूर को इन हिस्सों की राजधानियां होना चाहिए। पूर्व महाराष्ट्र यानी राज्य पुनर्रचना महामंडल द्वारा सुझाया गया विदर्भ का हिस्सा होगा उसमें नागपूर, भंडारा, वर्धा, यवतमाल, अकोला अमरावती, बुलढाणा, चांदा जिलों का समावेश रहेगा। मध्य महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के औरंगाबाद, परभणी, नांदेड, बीड़, उस्मानाबाद इन पांच जिलों के साथ नासिक, डांग, अहमदनगर, पूर्व और पश्चिम
खानदेश, सोलापूर जिले के कर्नाटक से सटे मराठी क्षेत्र का समावेश होगा और बचा हुआ बाकी हिस्सा पश्चिम महाराष्ट्र में जाएगा। इसमें ठाणे, कुलाबा, रत्नागिरी, पुणे, उत्तर भाग और दक्षिण सातारा, कोल्हापूर, बेलगांव और कारवार इन जिलों का समावेश किया जाए।
आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में ये तीन हिस्से कार्यक्षम रहेंगे और इस प्रकार के आयोजन से उस क्षेत्र के लोगों की आकांक्षाएं भी पूरी होंगी।
अखंड संयुक्त महाराष्ट्र की मांग मेरी नजर में अयोग्य है। क्योंकि, संयुक्त महाराष्ट्र में मराठवाड़ा जैसे जिलों के पिछडे हुए लोगों की प्रगति नहीं हो सकती। इस कारण संयुक्त महाराष्ट्र में गुलगपाड़ा मचने की संभावना है। इसलिए, पिछड़े मराठवाड़ा की प्रगति हो ऐसी इच्छा हो तो उनके लिए अलग मराठवाड़ा बना कर देना ही उचित होगा। मेरी कल्पना के अनुसार अगर महाराष्ट्र के तीन राज्य बनाए गए तो राजकाज के नजरिए से वे कार्यक्षम होंगे और जनता को अपनी उन्नति का मौका मिलेगा।
शैक्षिक नजरिए से मराठवाड़ा पिछड़ा इलाका होने के कारण मराठवाड़ा के लिए अलग विश्वविद्यालय की आवश्यकता है।
जनताः 24 दिसंबर, 1955