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स्थितियों में सुधार नहीं आने वाला। हमारे गांवों में रहने वाले इन अस्पृश्यों का अपने पुरखों के गांवों में रहने का मोह अभीखत्म नहीं हुआ है। उन्हें लगता है, यहीं अपनी रोजी-रोटी है। लेकिन, रोटी से अधिक महत्व सम्मान का होता है। जिन गांवों में उनके साथ कुत्तों जैसा व्यवहार किया जाता है, पग-पग पर उन्हें अपमानित किया जाता है जहां उन्हें अपमानित होकर - स्वाभिमान शून्य जीवन जीना पड़ता है ऐसे गांव किस काम के! गांवों के अस्पृश्य अपने गांवों से निकल कर वहां चले जाएं जहां परती जमीन हो। उस पर कब्जा कर अपनी मालिकियत कायम करें। जमीन पर कब्जा करते समय अगर किसी ने टोका तो उनसे साफ-साफ कहें कि हम जमीन छोड़ेंगे नहीं। हम सरकार को सही लगान देने के लिए तैयार हैं। नए गांव बसा कर स्वाभिमान से परिपूर्ण इंसानियत भरा जीवन जिएं। नए समाज का निर्माण करें। वहां के सभी काम करें। ऐसे गांवों में कोई उन्हें अस्पृश्य कह कर उनके साथ बुरा व्यवहार नहीं कर सकेगा। मेरा स्वास्थ्य ठीक होते ही मैं अस्पृश्यों द्वारा परती जमीन पर कब्जा करने की मुहीम चलाने वाला हूं।
अपने गरीब और अज्ञानी बंधुओं की सेवा करना पढ़े-लिखों का पहला कर्तव्य होता है। बड़े ओहदों पर जाने के बाद अक्सर पढ़े-लिखे अशिक्षित बंधुओं को भूल जाते हैं। अपने समाज के बारे में अपनत्व का भाव न होने के कारण ऐसा होता है। उनके मन में अपने बंधुओं के प्रति तिलमिलाहट नहीं होती यही इसकी वजह है। धर्मभावना का अभाव भी एक और कारण है। वे अगर अपने अनगिनत बांधवों की ओर ध्यान नहीं देंगे तो समाज का ”्रास होगा।
अन्य किसी भी धर्म से बौद्ध धर्म श्रेष्ठ है। मेरी इच्छा है कि आप सभी मेरे साथ इस वर्ष बौद्ध धर्म को स्वीकार करें। इस बारे में मैं आप पर जबरदस्ती नहीं करूंगा। यह आपकी मर्जी का सवाल है। लेकिन मेरे बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद मैं अस्पृश्य नहीं रहूंगा। आप सब जब बौद्ध बनेंगे तब आपके पास आरक्षित जगहों का अधिकार नहीं रहेगा। साथ ही हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि विधानसभा और लोकसभा में आरक्षित जगहों की मियाद संविधान के अनुसार केवल दस सालों की है। जल्द ही यह मियाद पूरी हो जाएगी। जिंदगीभर आरक्षित जगहें थोड़े ही रहने वाली हैं? आखिर हमें अपने सामर्थ्य के सहारे आगे बढ़ना है। आखिर हमें अपने ही पैरों परखड़े रहना होगा। आरक्षित जगहों के सहारे हम प्रगति हासिल नहीं कर सकते।
बौद्ध बनने के बाद, मैं आपका नेतृत्व नहीं कर पाऊंगा और मैं फेडरेशन में भी नहीं रह पाऊंगा। इसीलिए मेरी इच्छा है कि दलित वर्गीयों में से ही किसी ऐसे व्यक्ति को आगे आकर मेरी जगह और नेतृत्व की कमान सम्हालें। वरना एकखंभे के सहारे टिके तंबू की तरह अपना संगठन बिखर जाएगा।