408 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसी के अनुसार मुंबई में 24 मई, 1956 के दिन 2500वीं भगवान बुद्ध जयंति महोत्सव के उपलक्ष्य में भारतीय बौद्धजन समिति की ओर से नरेपार्क में विशाल सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में मुंबई के ही नहीं बाहर से आए लोग भी शामिल हुए थे। करीब पौन लाख महिला, बच्चे और पुरुष उपस्थित थे।
शाम साढ़े छह बजे सभास्थल पर डॉ. आबासाहेब अम्बेडकर का आगमन हुआ। उस समय सैनिक दल के करीब एक हजार स्वयंसेवकों ने उन्हें अनुशासनबद्ध सलामी दी। उस वक्त माहौल डॉ. बाबासाहेब की जयकार से गूंज उठा।
मंच पर बौद्धजन समिति के सभी सचिव, मुंबई प्रदेश शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के अध्यक्ष आयु. आर. डी. भंडारे, प्रो. वी. जी. राव, अंतुमामा गर्दे, विधायक कांबले, आयु. निकुंभ, मुं. प्र. शे. का. फे. के महासचिव वी. एस. पगारे आदि प्रतिष्ठित व्यक्ति और आयुष्मती माईसाहब अम्बेडकर उपस्थित थे। सभा के अध्यक्ष मुंबई के पूर्व मुख्यमंत्री आयु. बालासाहबखेर का बुद्ध की वंदना के बाद बौद्ध धर्म और बुद्ध चरित्र पर भाषण हुआ।
ठीक साढ़े सात बजे डॉ. बाबासाहेब ने महत्वपूर्ण भाषण की शुरुआत की। करीब सवा घंटे तक उन्होंने अपने बौद्ध धर्म संबंधित विचार लोगों के सामने रखे। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,
अध्यक्ष महोदय बहनों, और भाइयों,
आज बैसाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध के 2500वें परिनिर्वाण दिन पर ब्रह्मदेश सरकार के आमंत्रण के अनुसार मुझे रंगून में होना चाहिए था। लेकिन मैं आज यहां मुंबई में इस सभा में उपस्थित हूं।
पिछले पांच सालों से मैं बौद्ध धर्म पर एक किताब लिखने में लगा हुआ था। मेरी धर्म दीक्षा से पहले वैशाख महीने में उसका प्रकाशन हो यह मेरी इच्छा थी। इसी उद्देश्य को मन में रख कर मैं मुंबई आया। लेकिन एक विचित्र बीमारी से ग्रस्त हुआ और वह किताब मुझसे पूरी नहीं हो पाई। इस किताब में 700 पृष्ठ हैं और वह ग्रंथ अंग्रेजी भाषा में होने के कारण हम में से कई उसे समझ नहीं पाएंगे। इसीलिए, जल्द ही मैं उसका मराठी में अनुवाद करवाने वाला हूं। केवल इसी काम के कारण मैं रंगून नहीं जा पाया। हालांकि, उपस्थित जनसागर को देख कर मुझे बहुतखुशी हो रही है।
मैं 14 वर्ष का था तभी मुंबई की एक सभा में आयु. दादासाहब केलुस्कर द्वारा पुरस्कार स्वरूप मुझे भगवान बुद्ध के चरित्र की किताब दी गई थी। तभी से मेरे मन पर बौद्ध धर्म का असर है।
मैं जब छोटा था तभी से मेरे पिताजी हमसे रामायण-महाभारत आदि ग्रंथ पढ़वाते थे। पढ़े बगैर हमें छुटकारा नहीं मिलता था। लेकिन रामायण-महाभारत पढ़ने की जबरदस्ती हम पर क्यों? यह पूछने की हममें से किसी की हिम्मत नहीं थी। जिन पुराणों में शूद्र और