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अस्पृश्यों का वर्णन हर जगह दिखाई देता है उन पुराणों के जीवन चरित्र पढ़ने में हासिल ही क्या होने वाला था? मेरे जितना धर्मशास्त्रवेत्ता कोई नहीं। मैंने जब पिताजी से पूछा कि हम पर इन ग्रंथों को पढ़ने की जबरदस्ती क्यों? तो उन्होंने जवाब दिया कि- भले हम अस्पृश्य हों, रामायण-महाभारत के पुराण-पुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने के बाद हमारे मन की कुंठाएं भाग जाती हैं। उन्होंने जो बताया उसे हालांकि मैं ठीक से समझ नहीं पाया था।
महाभारत का द्रोणाचार्य अत्यंत पराक्रमी राजगुरु था। कौरवों और पांडवों को उन्होंने शस्त्रविद्या सिखाई। इसके बावजूद महायुद्ध में द्रोणाचार्य ने सच का साथ देने के बजाय कौरवों का साथ दिया, वे उन्हीं की तरफ से लड़े। क्योंकि वे कौरवों की नौकरी करते थे। असल में जिस कुंतीपुत्र कर्ण की हलके कुल में पैदा होने के लिए अवहेलना की जाती थी वही कर्ण असल में वीर था और नैतिकता जानने वाला महापुरुष था।
रामायण के राम का हम एकवाणी, एकपत्नी कह कर संबोधन करते हैं। लेकिन बाली और सुग्रीव में से एक की पत्नी दूसरे को देकर उसने एक का बाण मार कर वध किया। एक पत्नीव्रत की हांकने वाले राम की पत्नी का जब रावण ने अपहरण किया और उसे अशोकवन में ले जाकर रखा तब रावण से युद्ध करने से पहले राम पहले अशोक वन जाते और उसका हालहवाल पूछते। लेकिन मारुती (हनुमान) के बार-बार बताने के बावजूद रामचंद्र ने सीता, की तरफ जाकर उसका हाल नहीं पूछा। रावण के साथ द्रोह कर लंका का राज्य जीतने में उनकी मदद करने वाले विभीषण का पहले राज्याभिषेक करना यह कार्य राम की नजर में अधिक महत्वपूर्ण था। इसलिए ऐसे पुराणपुरुषों से हमारा क्या लाभ होने वाला है?
बौद्ध धर्म की तरफ में मेरा झुकाव बहुत पहले से है। वास्तव में 1951 की जनगणना में आपको सर्वधर्मीय और सर्वपंथीय लोग दिखाई देंगे। लेकिन पूरे भारत में एक भी बौद्धधर्मीय आदमी इस जनगणना में आपको दिखाई नहीं देगा। भारत में अगर एक भी बौद्धधर्मी नहीं तो आज 2500 सालों पहले हुए भगवान बुद्ध की हमें इतनी उत्कट याद क्यों आती है?
बौद्ध धर्म कोखोदकर निकाल हम क्यों उसकी पूजा कर रहे हैं? भगवान बुद्ध का धर्म है। बौद्ध धर्म का प्रसार केवल भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में है। धर्म प्रसार के क्षेत्र में राम और कृष्ण की पहुंच अधिक नहीं है।
कई लोग बौद्ध धर्म की शरारतपूर्ण आलोचना करते हैं। सावरकर उन्हीं में से एक हैं। असल में मैं नहीं जानता कि वे कहना क्या चाहते हैं? बुद्ध बुरे व्यक्ति थे? ऐसा उनका कहना है क्या? अगर वह कहना चाहते हैं कि बौद्ध धर्म का प्रसार करने वाले राजा बुरे थे तो उन्हें अपनी राय साफ शब्दों में रखनी चाहिए। मैं उन्हें जवाब देने के लिए तैयार हूं। केसरी में प्रकाशित किए गए- ‘बौद्धों की आततायी अहिंसा का शिरच्छेद’ में उन्होंने कुछ साफ तौर पर कहा नहीं है। सावरकर ही नहीं लेकिन किसी को भी बौद्ध धर्म के बारे में