24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भाइयों और बहनों, मुझे और कोई खास बात नहीं कहनी है। आपकी ध्येय प्राप्ति के लिए निश भाव, कर्तव्य परायण के बारे में मुझे पूरा विश्वास है। आपसे मैं ज्यादा कुछ मांगना नहीं चाहता। दिल्ली जाकर मैं एक ही उम्मीद रखूंगा और इंतजार करता रहूंगा। 11 तारीख के चुनावों में हमारी जीत के तार का!
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बात राष्ट्रवाद की, कृति जातिवाद की
‘‘अस्पृश्यों के हकों पर डाका डाल कर राजनीति की दृष्टि से उन्हें पूरी तरह ठगने के बाद जहां भी संभव हो वहां, हर तरह से अस्पृश्यों का मनोबल कुचलने का काम काँग्रेस द्वारा शुरू किए जाने के बड़े प्रमाण हमें मिलने लगे हैं।
मुंबई में पढ़ाई करने की इच्छा रखने वाले अस्पृश्य छात्रों के सामने कई तरह की मुश्किलें आती हैं, इसलिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने सोचा कि अस्पृश्य छात्रों को
खास रियायतें मिलें। इसलिए ‘पीपल्स एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना कर उसके जरिए सिद्धार्थ कॉलेज शुरू किया जाए। कॉलेज खोलने के लिए केंद्र सरकार से ग्रैंट ली गई और मुंबई विश्वविद्यालय से मान्यता भी प्राप्त कर ली गई है। जून में यह कॉलेज शुरू होने जा रहा है। अस्पृश्यों के लिए विशेष रियायतों वाले कॉलेज की स्थापना हो रही है और वह खुल भी रहा है, यह देख कर सवर्ण हिंदुओं में जलन पैदा हो चुकी है। हिंदू धर्म रूपी पेट के अंदर इस द्वेषरूपी जलन के कारण जो घपले पैदा हो रहे हैं उसकी आवाज 26 मार्च, 1946 के दिन केंद्रीय विधानसभा की बैठक में सुनाई दी।
1932 में पुणे करार का बोझ अस्पृश्यों के गले बांधने से पूर्व गांधी जब आखरी सांसें ले रहे थे, तब बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पंडित मदन मोहन मालवीय ने अपने शब्दों के सहारे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के मानो चरण ही पकड़ रखे थे। जिन लोगों के कहे को मान कर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने गांधी को जीवनदान दिया था, उनमें पंडित मदन मोहन मालवीय का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। इन्हीं मालवीय साहब के सुपुत्र ने कुत्सित बुद्धि से सिद्धार्थ कॉलेज के बारे में सवाल पूछे और कहा कि इस प्रकार के कॉलेज की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि, अस्पृश्यों की शिक्षा संबंधी सारी जरूरतें हिंदू समाज पूरी कर रहा है। पंडित गोविंद मालवीय के सवालों का डॉ. बाबासाहेब ने विधानसभा में जो जवाब दिया उसे हम यहां दे रहे हैं।’’ - संपादक, जनता।
जनताः 13 और 20 अप्रैल, 1946