238 26-3-1946 बात राष्ट्रवाद की, कृति जातिवाद की - मुंबई - Page 44

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अध्यक्ष महोदय,

फाइनांस बिल पर चल रही चर्चा में बोलने का मुझे अवसर दिए जाने के लिए पहले मैं आपका धन्यवाद व्यक्त करता हूं, क्योंकि मैं जो कहने वाला हूं वह मेरे विभाग से संबंधित नहीं है। अब तक हुई चर्चा में मेरे विभाग पर कोई विशेष टिप्पणी नहीं की गई इसका मुझे संतोष है। इसके बावजूद मैं बोलने के लिए उठ खड़ा हुआ हूं। कल फाइनांस बिल के बारे में बोलते हुए मेरे मित्र पंडित गोविंद मालवीय अस्पृश्यों के लिए

खोले जा रहे कॉलेज की योजना के बारे में भी बोले थे जिसकी वजह से आज मुझे बोलना पड़ रहा है।

कॉलेज की योजना का निरीक्षण शिक्षा विभाग ने किया और फाइनांस विभाग ने उसे मान्यता दी, इसलिए इन विभागों को ही अगर इस विषय में खुलासा करने दिया होता तो बेहतर होता। मैंने उस योजना को केवल लागू किया था। इसके बावजूद मेरे मित्र गोविंद मालवीय द्वारा उपस्थित किए मुद्दों का जवाब देने की जिम्मेदारी ऊपरिनिर्दिष्ट विभागों पर न डाल कर मैं खुद जवाब देने के लिए खड़ा हुआ हूं। इसकी केवल एकमात्र वजह है और वह है कि इस योजना की समीक्षा करते हुए मेरे मित्र ने उसे राजनीतिक लबादा उढ़ाने की कोशिश की है।

इस योजना के बारे में शुरू में ही मेरे मित्र ने कहा, ‘मुझे इस योजना के बारे में आश्चर्य होता है।’ मैंने जब उनका पूरा भाषण पढ़ा तब मुझे लगा कि उन्हें आश्चर्य लगने की वजह खुद उनकी धारणा है, जिसके कारण उन्हें लगता है कि शिक्षा क्षेत्र में दलीय अंधानुकरण का भूत घुस आया है। इस मामले में, मैं अपने मित्र को एक मशहूर कहावत याद दिलाना चाहूंगा कि- कांच के घरों में रहने वालों को दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिएं। इस कहावत के जरिए जो कहा जा रहा है वह पडिंतजी समझ पाएंगे या नहीं यह मैं नहीं जानता लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पंडितजी राश््रवाद की बातें बहुत अच्छी तरह कर लेते हैं। सादे हिंदुओं की बात तो दूर रही जिनके साथ अपना क्षेत्र-गोत्र नहीं मिलता उन ब्राह्मणों के हाथ का पानी तक न पीने का जिगर न रखने वाले पंडितजी जैसे आदमी राष्ट्रवाद की चर्पटपंजरी सभागृह के सदस्यों को और मुझे सुनाते हैं यह देख कर मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है।

धर्मांधता में सनी पवित्रता को किसी और की छुआछूत न हो इसका ख्याल रखने वाले को राष्ट्रवाद-जातिवाद का ह८ा मचाते हुए किसी और पर जातिवाचकता का, पार्टी का अंधानुकरण करने का, पक्षपात का आरोप करने से पहले थोड़ा सोचना चाहिए। बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय के साथ पंडितजी का गहरा ता८ुक था या है इस बात को वे न भूलें। मैं पंडितजी से पूछता हूं कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय क्या जातिवाचक संस्था नहीं है? बल्कि मैं तो यह कहना चाहता हूं कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय सभी हिंदुओं