340 10-6-1956 आजाद विचारों वाले, आजाद मनोवृत्ति के, निर्भय नागरिक बनें - नई दिल्ली - Page 431

412 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र मनोवृत्ति और निर्भिक नागरिक बनें

10 जून, 1956 को दिल्ली के अम्बेडकर भवन के मैदान में एक सभा का आयोजन किया गया था। इसमें तीस हजार से भी अधिक जन समुदाय उपस्थित था। दिल्ली की भारतीय बौद्धजन समिति की शाखा की ओर से 2500वां बुद्ध महापरिनिर्वाण दिन, जयंति और संबोधी दिन मनाने के लिए इस सभा का आयोजन किया गया था। कंबोडिया के आदरणीय वीर धर्मवीर महाथेरा सभा के अध्यक्ष थे। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,

बहनों और भाइयों,

ब्राह्मण धर्म अन्याय, निर्ममता, गरीबों के शोषण का जनक है। वर्णव्यवस्था में ब्राह्मण सबसे ऊपर वाली पायदान पर हैं। उनके बाद क्षत्रीय, उनके बाद वैश्य और इन सबका बोझ अपने सिर पर लिए सबसे निचली पायदान पर शूद्र हैं। शूद्रों को अगर अपनी उन्नति करनी हो तो उसे ऊपरी तीन वर्णों के साथ संघर्ष करना पड़ेगा। इन तीनों वर्णों का जरा भी मन नहीं होता कि वे शूद्रों के कल्याण की चिंता करें। वैश्यों और क्षत्रियों से धर्म ने ब्राह्मणों को अधिक श्रेष्ठ बनाया है इसलिए वे ब्राह्मण वर्ग के धार्मिक गुलाम हैं। सीधे-सादे शब्दों में कहना हो तो शूद्रों की उन्नति की राह के रोड़े बने हुए ये तीन वर्ण उसके दुश्मन हैं।

जिस समाज में धार्मिक स्तर पर लोगों को नोचा-खसोटा जाता हो, वहां किसी प्रकार की उन्नति की आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं? इसी कारण शूद्रों को हमेशा पैरों तले दबाए रखा गया और जब-जब उन्होंने विरोध में लड़ने के लिए कमर कसी तब-तब उनके सिर को गर्दन से अलग किया गया।

इसके ठीक विपरीत बौद्ध धर्म की ओर देखें, इसमें जातिवाद और विषमता का कोई स्थान नहीं। सभी अधिकार समान- धर्म में सबको समान अधिकार। कोई उच्च नहीं कोई निम्न नहीं।खुद बुद्ध ने अन्याय के खिलाफ लड़ कर ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ धर्म की स्थापना की।

पहले आर्य (ब्राह्मण) पूजा करते समय हजारों पशुओं की बलि चढ़ाया करते थे। पशु हत्या का इतिहास (गाय और भैंसों का कत्ल) अगर देखा जाए तो अंग्रेजों ने और मुसलमानों ने इस देश की जितनी गायें मार करखाई होंगी उससे अधिक गायें उस युग के ब्राह्मणों नेखाई हैं।

प्रबुद्ध भारत, 21 जुलाई, 1956